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Friday, 4 July 2014

केसरी side of wall

वैधानिक चेतावनी ~ राजनीतिक सासुमाएं कृपया इस पोस्ट को बहु की बनाई चाय समझ कर या तो पी जाएँ या टेबल पर ही रहने दें। पोस्ट को संसद ना बनायें।
केजरीवाल। अरविन्द केजरीवाल। ओह..मैं इसे बांड, जेम्स बांड जैसा sound करवाना चाह रहा था लेकिन ऐसा हो नहीं पाया।वैसे ऐसा तो होना ही था। इसके दो कारण हैं..
पहला - जेम्स बांड एक काल्पनिक character है।
दूसरा - केजरीवाल को diabetes है।

अगर आपको ये लगता है की ये इंसान एक looser ( looser शब्द कुछ ज्यादा ही आम होगया है हम teenagers में ) है तो जरा खुद को इससे थोडा compare कर लीजिये। और अगर आप इसके थोड़े भी पास आजाते हैं तो ... आप शायद सही कह रहे हैं.
जब आप अपने 20s में friendzone जैसे शब्दों के उधेड़बून में लगे थे आपसे करीब 20-25 साल पहले इस इंसान ने सामजिक नियमों के उलट लव मैरेज जैसा जघन्य अपराध करने की गुस्ताखी की थी। इतना ही नहीं इसने अपने सामाजिक जीवन को व्यवहारिक और पारिवारिक जीवन पर पर असर भी नहीं डालने दिया ( जी नहीं मैंने उल्टा नहीं लिखा है) और इसका एक बड़ा प्रमाण आप इन्टरनेट पर फैले इसकी बेटी के बोर्ड्स और IIT के memes से आसानी से पा सकते हैं। इतना ही नहीं केजरीवाल और उनका परिवार उस उदाहरण का भी हिस्सा हैं जिसमे घर की औरत घर की जिम्मेदारियां लेती है ताकि मर्द अपने मन का काम ( भले ही वो समाज सेवा क्यूँ ना हो ) बिना किसी economic दबाव के कर सके। डरिये मत ... आपसे ऐसा करने को नहीं कह रहा हूँ क्यूंकि आपको भी पता है की आप  hypocrite हैं। और इसके बावजूद आप उनकी मनः स्थिति की गंभीरता , शालीनता और ठहराओ को उनके इंटरव्यूज में आसानी से परख सकते हैं।
ये तो कुछ ऐसी बातें थी जिनपर हमारा जवाब होता है- "अरे मौका हमें भी मिलेगा तो हम भी दिखा देंगे बड़े आये कटाक्ष करने ". लेकिन जनाब कुछ ऐसी भी खूबियाँ मैं गिना सकता हूँ जिससे शायद आपको अपने जवाब में थोड़ी तब्दीली ला सकें ( जवाब तो फिर भी आपके पास कोई ना कोई होगा ही)..
1. IIT में 1000 से कम रैंक। 
2. IAS में सफलता पाकर IRS के अंतर्गत joint commissioner इनकम टैक्स।
3. अपना NGO शुरू करके उसी डिपार्टमेंट में लोगो को घूस लेने से रोकना।
4. RTI जैसे नियमों को जनता के बीच लाकर सिस्टम में पारदर्शिता लाना और इस काम में अपने योगदान करनेके लिए Magsaysay जैसे पुरस्कारों से नवाजा जाना।
5. लोकपाल बिल को लागू करवाने के लिए सतही जोर लगाना जब की आपको पता है की पिछले चार दसक से येही कोशिश की जा रही है।
6. दिल्ली का cm बनना।
7. दो महीनों की तयारी में पंजाब जैसी जगह से चार MP's सामने लाना जिनका कोई राजनितिक इतिहास ना हो।

एक मिनट। शायद नीचे के दो points में मैं थोडा पोलिटिकल कमेन्ट कर बैठा।
8. ये पॉइंट सबसे ज़रूरी है । केजरीवाल नें हममे, जिसे हम youth कहते हैं में, राजनीती के प्रति थोड़ी उम्मीद जगाई। वो उम्मीद जो हमने दशकों पहले छोड़ दी थी। कल तक जो क्षेत्र सिर्फ गुंडों और दबंग लोगों का माना जारहा था आज आम जनता को अपनी बागडोर देने के लिए तैयार है। और आप MTV से थोडा वक़्त निकाल कर अगर न्यूज़ चैनल देखते हैं तो जनाब इसका थोडा तो श्रेय इस इंसान को जाता ही है।
ये सच है की उसने गलतियाँ की हैं जो उसे नहीं करनी चाहिए थी। ये भी सच है की उसने कुछ फैसले किये जो उसे नहीं करने चाहिए थे। ये भी सच है की उसने कई टारगेट्स बनाये जिसे छूने में वो असफल रहा। लेकिन उसके टारगेट्स steep थे। steep जिसे छू पाना आसान नहीं था। और ऐसे टारगेट्स एक achiever ही बना सकता था। इस इंसान की सफलताओं की लिस्ट असफलताओं से लम्बी है और पिक्चर अभी (बहुत) बाकी है मेरे दोस्त।
अगली बार जब आप लोकल ट्रेन में सफ़र करते हुए या BARISTA की कॉफ़ी का लुत्फ़ उठाते हुए भारत की राजनीतिक गुरुत्वाकर्षण पर अपने विचार प्रकट कर रहें हों तो उसे राजनीति तक ही केन्द्रित रखने की कोशिश करियेगा और अगर आपके पास फैक्ट्स कम पड़ गए हैं और आप पर्सनल होना भी चाहते हैं, तो एक बार ये पेज खोल लीजिएगा। शायद थोड़ी मदद मिले।
ps. अम्मा यार ...satire कौन ले गया रे इस पोस्ट का।

Saturday, 18 January 2014

Gud-marning-दीदी

13. ये गिनती थी उन नर्सेज की जो उन 23 ICU मरीजों के बीच थीं. ये नंबर्स सुनने में जितने अजीब और बेढंगे थे उनसे जुड़ा मेरा experience उतना ही मजबूर और दिलचस्प था. 

ये हॉस्पिटल है. और यहाँ सभी परेशान, दुखी, tensed और exhausted हैं. जी हाँ .. एकदम वैसे ही जैसे हम उम्मीद करते हैं. आप जागें हों या सोने की जुर्रत ही क्यूँ न कर रहे हों आप उस सन्नाटे से डर जाते हैं जिसकी खोज आपको सुबह या कई दिनों से थी. आप समझ नहीं रहे होते हैं की आप चाह क्या रहे हैं.

पहले दिन काफी भागमभाग और उतार चढ़ाव के व्यवहार के बाद आपका मन थोडा शांत होता है. आप थक चुके होते हैं, शरीर से और मन से भी. अब आप अपने चारो तरफ देखते हैं और पाते हैं की आप पर ही सभी की नज़र टिकी है. हर तरह की बेजान नज़रें.. शायद इतनी तरह की बेबसी जिसे खत्म करने के लिए शायद हमारे पास जड़ी बूटियों की कमी पड़ जाएं. ये ऐसी जगह जान पड़ती है जहाँ आपकी दिक्कतें सबसे कम जान पड़ती हैं... लेकिन इस समय आप अपनी परेशानी को दूसरों से कम आंकने की स्थिति में नहीं हैं...आपको थोडा असहज सा लगता है, लेकिन आपकी गाडी में इतनी जगह नहीं बची हुई है की आप उस असहजता के साथ सफ़र कर सकें. इससे बचने के लिए आप आँखें बंद करते हैं, इससे आपको काम भर का 'भ्रम' मिल जाता है की कोई आपको देख नहीं रहा है.

अरे ... ये हंसने की आवाज़ कहाँ से आपके कानों में पड़ी... वो भी इतनी तेज और बेबाक हंसी.. कौन है ये insensitive इंसान, जिसे इतनी भी तमीज नहीं की एक हॉस्पिटल में इंसान को कैसा बरताव करना चाहिए.. एक मिनट.. कहीं ऐसा तो नहीं की वो आपका मज़ाक बना रहा हो... हो भी सकता है, इंसान में इंसान की कमी तो आजकल होती ही जा रही है.

आप माथे पर एक सिकन लिए हडबडा कर उस प्लास्टिक की कुर्सी से उठते हैं और इधर उधर देखने लगते हैं. देखने लगते हैं की बस वो इंसान दिख जाए जिसने ऐसा किया और आप उससे इस 'जुर्रत' के लिए अपनी जबान गन्दी कर सकें.. आप इधर उधर थोड़ी देर देखते हैं लेकिन आपको वहां कुछ नर्स ( शायद कुछ से थोड़ी ज्यादा ) और आपके जैसे ही आँखें फाड़े कुछ लोग और भी दिखते हैं जो अपने साथ किसी अपने को लेकर यहाँ आये हुए हैं.

आपको ये समझने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता की ये ठहाके किसी और की नहीं बल्कि उन नर्सेज की हैं जो आपने सामने ही झुण्ड बना खड़ी हैं. वो आपके सामने खड़ी हैं और एक दुसरे के कानों में धीरे बोलने की ना-के-बराबर कोशिश करते हुए उनके हाथ सर्कस के किसी कलाकार की तरह दवाइयां छांटने और सिरिंज को बांटने में लगे हैं.

वो ऐसा कैसे कर सकते हैं. जी नहीं !!! ये सवाल आपके सामने के करतब बाज के लिए नहीं है, ये सवाल तो उस शख्स के लिए है जो आप पर शायद हंस रहा है. उस हंसोड़ के लिए है जो भावनाविहीन मालूम होता है. आपको अब उस इंसान से थोड़ी झुंझलाहट होने लगी है जो आपके यहाँ आने पर सबसे पहले आगे बढ़ कर आया था और अपने ऊपर सारी जिम्मेदारियां लेकर इतनी शिद्दत के साथ लग गया था. और अब वही नामुराद ऐसे निरलज्यों की तरह ठहाके लगा रहा है.

आप अभी इसी उहापोह में ही थे की तभी वहां कहीं से एक लम्बे कद की औरत जो शक्ल से ही चीफ-वार्डन लग रही थी आ जाती है. उन्हें अन्दर आता देख सारी नुर्स एक साथ शांत हो गई... चलो उन्हें ये एहसास तो है की जो वो कर रही हैं वो सही नहीं है.. आप अन्दर से थोडा खुश होते हैं... अच्छा हुआ ये आ गई..अब या तो ये खुद उनकी ये हरकत देख लेगी या मैं खुद ही उनकी इस कारस्तानी के बारे में बता दूंगा.

लेकिन ये क्या !!! सभी उस चेइफ-वार्डन की तरह तेजी से बढ़ रही हैं..और इस बार तो उनकी आवाज के साथ साथ उनके चेहरों पर भी चमक है.. सभी ने उनका हाथ पकड़ा और लगभग एक ही वक़्त में सभी के मुंह से निकला "गूड-मार्निंग- दीदी". और उन्होंने भी सभी का मुस्कुरा कर अभिवादन किया..."गूड मोर्निंग बहनों".. हाँ..यही शब्द हैं उनके. और इस बार उनकी आवाज़ पूरे वार्ड में गूँज गई. गूंजती भी क्यूँ ना, उन्होंने सारे "गूड मोर्निंग बहनों" को अपने अन्दर से descending-order में जो निकाला था.

आप अबतक जितना annoyed महसूस कर रहे थे अब उतना ही अजीब भी महसूस करने लगे हैं. आखिरकार ये लोग अपने काम के वक़्त ही तो गप्पें हांक रही थीं. लेकिन फिर भी इनके अन्दर दूसरों को छोडिये अपने सीनियर का भी डर नहीं है. आप इस सवाल को मन में लिए अपनी कुर्सी के बगल से लगे बेड पर पड़े हुए उस इंसान पर पड़ती है...आपको जो दिखता है वो एक सुकून भरा सुखद-आश्चर्य होता है. जिस इंसान को आप आधे घंटे पहले एक निर्जीव स्थिति में वहां लाये थे उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. एक नायब मुस्कान जो डॉक्टरों की की गई भविष्यवाणी से काफी पहले आ गई थी. एक मुस्कान जिसने आपके दिन भर के थकान को चुटकी में खत्म कर दिया था. लेकिन जरा ठेहेरिये ... उस मुस्कान का असली श्रेय किसे जाएगा... डॉक्टरों को ...अच्छी दवाइयों को या किन्ही और को .... किन्ही फूहड़ औरतों को जिनको शायद भगवन ने सबसे अच्छी हंसी से तो नहीं ही नवाजा है. 


शायद डॉक्टरों की भविष्यवाणी गलत इसलिए हो गई क्यूंकि उन्होंने दवाइयों की गिनती में कुछ ठहाकों की संख्या में कमी कर दी थी. ठहाकों की वो संख्या जो उन नर्सों को याद थीं और जिसे देने में उन्होंने कोई कंजूसी नहीं की. उस वक़्त शायद हमारे जैसे कई मरीजों को दवाइयों से ज्यादा माहौल की ज़रुरत थी, कुछ मुस्कराहट की ज़रुरत थी. वो मुस्कराहट  जिसकी यहाँ आपसे उम्मीद नहीं की जाती. इन ठहाकों के लिए ना तो इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है और  ना ही सैलरी. और इसके बावजूद उन्होंने अपने काम को पूरे शिद्दत से पूरा किया... आपने शायद फैसला करने में थोड़ी जल्दबाजी कर दी थी. लेकिन कोई बात नहीं ... अब आपकी बारी है... कुछ गंभीरता में कटौती करने की .... कुछ अनजाने चेहरों पर अनचाही मुस्कान बिखेरने की... कुछ बेपरवाह ठहाकों की... कुछ दफा judgmental ना होने की... कुछ दूसरों के काम को appreciate करने की...कुछ खुद के काम से दूसरों को ख़ुशी देने की ...  अब आपकी बारी है कुछ उमीदों पर खरा ना उतरने की... कोशिश कीजिये... इतना मुश्किल भी नहीं है. 

Thursday, 26 December 2013

Raw Sun

हर बार ज़िन्दगी हमसे आगे भागती है. बहुत तेज़. और हम उसका पीछा करते हैं. और कई बार हम इतनी तेज़ी से पीछा करते हैं की हमें ये भ्रम हो जाता है की शायद हम इससे आगे भी निकल सकते हैं. लेकिन ऐसा भ्रम हमें ज्यादा वक़्त तक नहीं रहता. ये एकदम आइंस्टीन के थ्योरी जैसा है आप कितनी भी तेज भागिए आप लाइट की स्पीड से ज्यादा नहीं जा सकते. वैसे ही जिंदगी भी कितनी भी स्पीड से भागने की कोशिश करे वो आकर कहीं ना कहीं थम ही जाती है. और अगर ये ठहराव अचानक से आपके सामने आ जाती है जिंदगी के नियम आँखों के सामने थोड़े धुंधले पड़ते से लगते हैं.
ऐसे वक़्त में आपके सेंसेस स्थिर हो जाते हैं और आप किसी भी emotional चेंज को संभाल नहीं पाते. आप दुखी रहते हैं. चीखते हैं. सिसकते हैं. अपनी भावनाओं को व्यक्त करते हैं. या नहीं करते हैं.
लेकिन फिर वक़्त बीतता है और आप खुद को सँभालते हैं. कोशिश करते हैं. रोकते हैं. अपने को मज़बूत करते हैं. अब आपकी इन्द्रियां अचेत अवस्था से जागती हैं और आप उस अँधेरे, दम घोटते कमरे से बाहर की तरफ देखते हैं. लेकिन अब भी आप वो दरवाज़ा खोलना नहीं चाहते. आप डरते हैं रोशनी से. उस सोच से जो बाहर है. उस अकेलेपन से, उस कमी से जो अब तक उस उजाले को और भी प्रकाशमय बनाये हुए थी और अब जो वहां ना हो.
आप बाहर देखते हैं और पाते हैं की वहां बाहर बहुत सी आँखें किसी की कमी बयां कर रही हैं. सबके आंसू सूख चुके हैं, लेकिन अब भी वे बेजान हैं. लेकिन ये क्या !!! ये अब भी कुछ ढूंढ रही हैं. इस बार ये ऑंखें उस खामोश रोशनी की तलाश नहीं कर रही हैं. ये किसी और की तलाश कर रही हैं. शायद उसकी जिसने बहोत वक़्त से उस कमरे में खुद को बंद कर रखा है. शायद उसकी जो उस घुटन भरे कमरे में रहने की आदत डाल रहा है. शायद आपकी.
अब बाहर झांकने का नहीं निकलने का वक़्त आ गया है. लोगों की आँखों में भ्रम पैदा करने का वक़्त आगया है. जिंदगी चलती रहनी चाहिए और उस चौथे पहिये का काम आ गया है.
आप बाहर आते हैं और पाते हैं की जिंदगी किसी अँधेरे में गुमनाम, चुपचाप, असहाय और अस्थिर पड़े रहना नहीं है बल्कि उस उजाले में है जो ना सिर्फ सूक्ष्म से बीज में जान डालती है बल्कि आपको खुद को संभाल कर उस अँधेरे ज़मीन से बाहर निकालने की हिम्मत भी देती है.

आप अगली सुबह जागते हैं और रोशनी को देखते हैं. आपमें बहोत एनर्जी है लेकिन अब आप बहोत उत्तेजित नहीं होते उसे देखकर. आपको पता है आप क्षितिज को छू नहीं सकते और अब आप छूने की कोशिश भी नहीं करते. लेकिन आप उसकी तरफ अपने क़दमों को नहीं रोकते. आप उसकी तरफ जाते रास्ते पर सफ़र करने को तैयार हैं. अब आपको पता है की जिंदगी किसी जगह पहोचन नहीं बल्कि एक सफ़र है. सफ़र एक ऐसे रास्ते पर जहाँ आपको दोनों extremes के बीच से अपनी गाडी निकालनी है. आप उस गाडी के सारे पुर्जों को एक बार फिर चेक करते हैं और एक नए, बिलकुल नए सफ़र पर निकल पड़ते हैं...


ps. Rest in peace ...you !

Tuesday, 5 November 2013

उफ्फ्फ...तुम्हारे Opinions !

अपूर्व को इंडिया पाकिस्तान के मैच के बाद इतना गाली देते हुए आज देख रहा हूँ। मैंने उसे कहा भी की भईया इतनी बड़ी बात भी क्या हो गई। कौन सी दुनिया उजड़ गई आपकी। एक जीन्स ही तो है जो दूकानदार ने खराब दे दी है। इतना क्या स्यापा पाना इसपर। उसने जिस तरह से मुझे देखा मुझे अन्दर से महसूस हुआ की अगर बन्दे को इस वक़्त एक straw मिल जाता तो वो पक्का मेरा खून ही पी जाता। और उस दिन लगभग सारे हॉस्टल को ये बात पता चल गई की Levi's की जीन्स अगर बुरी नहीं है तो अच्छी भी नहीं है। इस तरह से एक बन्दे के सिर्फ एक जीन्स पर एक छोटी सी opinion की वजह से , ये कुछ सौ लोगों के दिमाग में levi's store में कदम रखने से पहले एक बार घंटी तो ज़रूर बजेगी।

ये सिर्फ एक जीन्स की बात नहीं है। जिंदगी की हर छोटी चीज़ जो हमसे जुडी है हम उसपर जाने अनजाने एक opinion ज़रूर बनाते हैं। और न सिर्फ ये opinion बनाते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों के साथ अपने विचार और experiences भी बाँटते हैं।

हम dominoes गए। वहां का खाना अच्छा या बुरा। हम अपना opinion रखते हैं।
कोई नया mall खुला शहर में। पिछले वाले से उसका comparison । हम अपना opinion रखते हैं।
मैंने नया samsung फोन लिया। बहोत गर्म होजाता है। कुह अच्छे features भी हैं। हम अपना opinion रखते हैं।
एक नयी फिल्म देखी। गाने कुछ ज्यादा ही थे। हम अपना opinion रखते हैं।

इंसानों का एक basic और अनुवांशिक nature होता है opinion बनाना। और न सिर्फ बनाना बल्कि उसे दूसरों के सामने express करना। और ये शर्मिंदा होने की बात नहीं है। बल्कि ये तो प्रमाण है की आप इंसान हैं।
ये ही opinions जब एक समूह में लिए और बनाये जाते हैं तो ये trend का रूप ले लेती है और फिर ना ही सिर्फ social बल्कि commercial और economical रूप से वर्चस्व बनाये हुए organisations को भी अपने सबसे सूक्ष्म और बेसिक समूह के हित में काम करने को मजबूर कर देती है। और आपको जानकर थोडा आश्चर्य हो सकता है लेकिन ये सूक्ष्म और बेसिक समूह कोई और नहीं हम खुद हैं।

यही वजह है की आम लोगों के opinion बनाने से बहोत से "लोगों" को डर लगता है। ये वो लोग हैं जो market में पकड़ बना चुके होते हैं और व्यावहारिक स्तर पर profit कमाना ही जिनका उद्देश्य रह गया है। और अब इन्हें अपनी गिरती value की वजह से अपने सर्विस और कीमतों में सुधार लाना होगा जिससे अंत में फायदा उस सूक्ष्म समूह को ही होगा जो हमसे बनती है।

इसीलिए opinions या तो अच्छे हों या बुरे। मीठे हों या कडवे। आप उसपर ban या रोक नहीं लगा सकते। और अगर आप या कोई राजनितिक पार्टी ऐसा करने की कोशिश करते हैं तो दो ही बातें हो सकती हैं।

1) या तो आप उस निचले और सूक्ष्म स्तर, जो की हम आम आदमी हैं, की कोई चिंता नहीं करते।
2) या आप डर गए हैं।

इसलिए अपनी बात रखिये और इंसान होने का प्रमाण दीजिये। एक ऐसा इन्सान जो ना सिर्फ जगा है बल्कि चौकन्ना भी है। जो सिर्फ विचार बनाता नहीं बल्कि उसको व्यक्त करने का साहस और हुनर दोनों रखता है। ऐसा इंसान जो अपने पूर्वजों से एक कदम आगे रहा है। जो evolution की सीढ़ी में आगे जाने को तैयार है। हम और आप। फैसला कोई भी हो.. आप अपना opinion देंगे... और उसी का मुझे इंतज़ार भी रहेगा हमेशा की तरह।

Wednesday, 2 October 2013

अरे... कौन है उधर !!!

O..NO.NO.NO….Nope… मैं कैसे !! मैं इतना छोटा हूँ अभी. इतना अपरिपक्व. मैं, मेरे विचार ना तो इतने विस्तृत हैं और ना ही अनुभवी की मैं इस बारे में कुछ लिख सकूँ.
ये ही जवाब था मेरा (और शायद आपका भी ) जब मुझसे किसी दोस्त ने कहा ... "भगवान् के बारे में लिखो."
मजाक है क्या उसके बारे में लिखना जिसे मैं मानता भी हूँ और नहीं भी. जनता भी हूँ और नहीं भी.

उसके बारे में लिखना जो वस्तु भी है और भावना भी. विश्वास भी है और अंध-विश्वास भी. जिसे आप मूर्ति माने ना माने आपकी श्रधा में कोई कमी नहीं आती. जिसे हम दुःख में भी उतना ही याद करते हैं जितना सुख में. क्या लिख सकता था मैं उसके बारे में.

मैंने उसे हमेशा एक 'सिक्के' की तरह माना है. जो खुद में दो पहलु लिए होता है. लाभ भी और हानि भी. सुख भी और  दुःख भी. खूबसूरती भी और बदसूरती भी. वो किसी एक पहलु का ना तो चयनकर्ता है और ना ही उत्तरदायी.

हमें कई बार भ्रम हो जाता है की हमारे साथ जो अच्छा हो रहा है वो ऊपर बैठा कोई इश्वर कर रहा है. वहीँ जैसे ही हमारे साथ कोई बुरा होता है हमारा विश्वास कम होने लगता है. मुझे नहीं लगता की उसपर आपके कम या ज्यादा विश्वास का कोई फर्क पड़ता होगा. अगर कोई है जिसपर फर्क पड़ता है, तो वो हम हैं.

जब हम कोई काम इस उम्मीद से करते हैं की कोई है जो हमारा साथ दे रहा है, कोई है जो हमारे साथ कोई बुरा नहीं होने देगा. उस वक़्त हम सिर्फ खुद को ही नहीं अपने आसपास के सभी जीवित और निर्जीव चीज़ों में एक पॉजिटिव एनर्जी दे रहे होते हैं. वो एनर्जी जो हमारी ही बने होती है हमारे ही लिए. इसका उल्टा अगर हम लेते हैं. हम अपने दिन की शुरुआत किसी नेगटिव विचार से करते हैं, तो हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने आसपास की सभी चीज़ों को हतोत्साहित कर रहे होते हैं. हमारा खुद पर से विश्वास कम हो जाता है. और ये तो इंसानी फितरत है, अगर खुद पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं तो किसी अनजान शक्ति पर कैसे कर लें.

अगर हम टेक्निकल भाषा में बात करें तो ये एकदम एक modulus ( |x| ) की तरह है, आप इसमें पॉजिटिव वैल्यू डालें या नेगेटिव रिजल्ट हमेशा एक पॉजिटिव वैल्यू होगी. हमें नहीं पता वो कौन है लेकिन ख़ुशी हो या गम हम उसे ही याद करते हैं. ये एक ऐसा पैरामीटर है जिससे हम नेगेटिव एनर्जी और positve एनर्जी ...दोनों को explain करते हैं. 
ये एक ऐसी एनर्जी है जिससे हम सभी जुड़े हुए हैं. अगर हम किसी को दुःख में देखते हैं, भले ही उसे हम जानते हों या ना हो, हमें दुःख होता है. हम उम्मीद करते हैं की काश उसके साथ ऐसा न हुआ होता. ये इस बात का एक बड़ा उदाहरण है की हमारे अन्दर कहीं न कहीं ये बात केन्द्रित होती हैं की हम एक दुसरे से जुड़े हैं और एक दुसरे की खुशियों या दुखों से प्रभावित होते हैं. ये प्रभाव ही वो शक्ति है जिसे हम शब्दों में भगवान् कह देते हैं.

अगर हम Christianity की बात करें तो उनमे उसे GOD नाम से जाना जाता है..जो असल में तीन शब्द Generator , Operator और Destroyer. हिन्दू धर्म में भी हम उसे ब्रह्मा , विष्णु और महेष नाम नाम से जानते हैं... जिनका काम Generation, Operation और Destruction था. इसके बारे में आपको बताने की ज़रुरत नहीं लगती मुझे. मेरा बस एक ही पॉइंट है. अगर पृथ्वी के दो अलग अलग छोर पर अगर एक जैसे विचार को अगर महज एक संयोग भी मान लें, तो भी इनपर विश्वास ना करने का ठोस कारण हम नहीं दे सकते.

बड़ी बड़ी चीज़ों में उसे खोजते खोजते छोटी छोटी चीजों पर से हमारा ध्यान भटक गया है. साइंस में हमने पढ़ा है की पानी भले ही बड़े से बर्तन में हो या एक छोटे से चम्मच में, ना तो उसकी अहमियत कम होती है और ना ही उसके लिए हमारी प्राथमिकता. वैसे ही हमें भी छोटी चीजों में उसे भूलना नहीं चाहिए. बड़ी खुशियों की और भागते हुए छोटी खुशियों को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए.

जैसा की मैंने पहले भी कहा है की मैं बहोत ही साधारण सा इंसान हूँ. मुझे तो वो बस एक छोटी सी हंसी में दिखता है. ठंढे से हवा के झोंको में. रंग बदलते पत्तों में. पके हुए फल में . काम से थक कर एक दोस्त से बात करने में. एक ' miss you, kamine' वाले मेसेज में, एक फोटो पर लड़ते हुए दोस्त में, रक्षाबंधन पर बहन की तरफ से आई राखी में, एक पुराने फोटो एल्बम के अचानक मिल जाने में, ट्रेन के सही समय पर पहुचाने में, मेट्रो में मशीन की तरह घुमते वक़्त किसी पुराने दोस्त के पीछे से कंधे पर हाथ रखने में, किसी को शुक्रिया कहने पर 'मर क्यूँ नहीं जाता' सुनने में, किसी सुबह आंख खुलने पर खुद को घर पर पाने में, सुबह सुबह unhygienic सी ब्रेड रोल खाने में, बारिश में नहाने में, पहले बर्थडे बम्प्स में, तुम्हारी पहली कमाई में, यहाँ तक की एक 3G कनेक्शन में भी .... मुझे उसे मानने या ना मानने की ज़रुरत नहीं. अगर वो है तो उसे इन सब के लिए बहोत बहोत धन्यवाद. और अगर वो नहीं है तो इनसब लम्हों को मेरी जिंदगी में आने और लाने के लिए आप सभी को धन्यवाद. 

Thursday, 22 August 2013

One Dollar Rupee

आज़ादी के वक़्त जब हमारे economists  ने हमारे देश में समानता की बात की थी तब उनकी इच्छा हमारे देश में अमीरों को सडको पर लाना नहीं था. वो बस इतना चाहते थे की हमारे देश की कमज़ोर और ग़रीब जनता अपने जीवानसैली में थोड़ी बढ़ोत्तरी लाए.
चलिए एक बहोत ही उलटी situation imagine करते हैं. एक ऐसा देश जहाँ अमीर और अमीर हो रहे हैं और ग़रीब और ग़रीब. यही एकलौती सबसे बड़ी चिंता थी हमारे देश में आने वाले समय में.
रुकिए रुकिए ..कहाँ भागे जा रहे हैं आप... मैं कोई economics का lecture नहीं देने वाला आपको. बस मैं एक बहोत ही छोटी सी बात share करना चाहता हूँ जो अचानक से आज मेरे जेहन में तब आई जब मैं अपनी कार में पेट्रोल भरवाते हुए रोड के किनारे एक भिखारी को प्याज़ खाते देखा. क्या सच में वो गरीब था या किसी राज्य का राजा जो ख़ुफ़िया तरह से अपने राज्य के लोगों को जांचने आया है. जी हाँ मजाक ही कर रहा हूँ.
इस वक़्त हमारे देश में इन दोनों से भी अलग situation आ गई है. जरा सोचिए. आज ना तो कोई अमीर और अमीर बनने लायक बचा है और ना ही कोई ग़रीब और ग़रीब. अरे मैं बस इमानदार अमीरों की बात कर रहा हूँ. और ग़रीब..common...वो 5 रूपए में अपना पेट भर तो रहे हैं अब क्या जान लोगे उनकी.
वैसे जरा situation समझिए. हमारे पास आज सभी चीजें एक दाम पर मिल रही हैं. प्याज़, पेट्रोल, दारु.
प्याज़ - आपनी जमीनी ज़रुरत
पेट्रोल - आपके आराम का सामान
दारु - आपके ऐयाशियों का सामान
अब आप समझ सकते हैं की ये economists आपसे चीख चीख कर जो कहना चाह रहे हैं. जी हाँ!!! अब आपके समझ में आया ना. या तो आप अपना बहुमूल्य पैसा अपने ऐयाशियों में उडाएं, अपने आराम की जिंदगी जिसका आपने सपना देखा था उसमे उडाएं या फिर अपनी जिंदगी की सतही ज़रूरतों में उड़ाते उड़ाते निपट ही जाएं आप.
ये आपको हर माल 10 रूपए जैसा लग सकता है. लेकिन विश्वास करिए ये ही आज का समानता का उद्देश्य रह गया है.
आज हम डॉलरों की बात करते हैं...आज 62 रूपए कल 64.5.. मैं कहता हूँ फालतू की mathematics में पड़े हो दोस्त, ज़रा पाउंड्स पे नज़र तो दौडाओ वो तो हमारे mathematics की सारी झोल को खत्म करने में लगा है. हाँ भाई 100 रूपए को एक पाउंड में बदलना 85 रूपए को बदलने से कहीं ज्यादा कम सर दर्द का काम है.
मेरे कुछ दोस्त आज से कुछ साल पहले UK shift हुए थे. आज उनकी जॉब की salary में भले ही कोई बढ़ोत्तरी न हुई हो लेकिन जब मैं यहाँ से देखता हूँ तो उनकी मासिक आय लगभग 20% बढ़ी हुई दिखती है...आपको नहीं दिख रहा है क्या. मुझे विश्वाश है की जिस दिन आपको दिखेगा आपका विश्वास Brain-Drain जैसे imaginary शब्दों से उठ जाएगा.
अब समाज के बड़े बड़े विचारक इस imaginary concept पर कोई comment क्यूँ नहीं करते.
कल मेरे एक दोस्त से बेहेस हो गई. उसने कहा की क्यूँ हम पिछले कुछ दिनों से सारा काम छोड़कर इस बढती " रूपए की इज्ज़त " पर ही लम्बी लम्बी कहानियां गढ़ रहे हैं. क्या इससे प्याज़ की कीमतों में कमी आएगी या फिर डॉलर की कीमत में कोई कमी. उसका कहना मुझे कहीं से भी गलत नहीं लगा.
आज भी हमारे देश की 80% जनता " क्यूं " जैसे सवालों से अपना पेट नहीं भर्ती. उसे आज भी अपनी जिन्दगी चलाने  के लिए " क्या और कैसे " जैसे सवालों से जूझना पड़ता है. और अगर उसने इस सवाल का जवाब जैसे तैसे दे भी दिया फिर भी " क्यूँ " जैसे सवाल के जवाब देने की ना तो हमने शिक्षा दी है और ना ही अधिकार.
अरे मैं कोई बड़ी बातें नहीं कर रहा. मुझे आज बुरा बस ये लगा की आज mess में मुझे सलाद में प्याज नहीं दिखे. मैं सलाद में प्याज के ना होने पर जब इतना कुछ कह सकता हूँ अपनी भड़ास निकाल सकता हूँ , तो ज़रा उनका सोचिए जो खाने की प्लेट से एकलौते प्याज़ के चले जाने पर भी कुछ नहीं कह सकते, अपनी भड़ास नहीं निकाल सकते. यकीन मानिए आप ग़रीब नहीं हैं.


Thursday, 15 August 2013

State of Independence

Independence day. एक ऐसा दिन जिसकी ख़ुशी हर एक भारतीय को होती है। कुछ को ज्यादा, कुछ को कम। कुछ अन्दर से खुश होते हैं तो कुछ बस दूसरों की ख़ुशी के लिए। कुछ इसे सुबह जल्दी जग कर मनाते हैं तो कुछ देर तक सो कर।
ख़ुशी हो भी क्यूँ ना, कम से कम एक दिन तो हमें मिलता है जिस दिन हम हर तरह से खुद को तस्सली दिला सकते हैं की भईया सच में हम आज़ाद हैं। वरना कहाँ इस बेरहम भाग दौड़ वाली जिंदगी में इस बात का एहसास हो पाता है। दिन भर देश के एक बड़े शहर के छोटे से कोने में बहोत ही तेजी से पूरी दुनिया से जोड़े रखने वाली मशीन के सामने बैठे रहने पर , कहाँ इस आज़ादी का लुत्फ़ उठा मिलता है।
इसमें कुछ गलत नहीं है। हमें पूरा हक है की हम जैसे चाहें वैसे अपनी स्वतंत्रता को enjoy  करें। बात बस इतनी सी है की क्या हमें पता है की हमें अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कैसे करना है या हम कैसे कर सकते हैं और फिर भी नहीं करते। हम आज भी इंतज़ार करते हैं की कोई आकर हमारी बात आगे रखे। कोई आए जो हमारी दिक्कतों और परेशानियों का solution ढूंढें। हमें कुछ बोलने, कुछ चित्रित करने,कुछ सोचने से पहले भी इस बात का डर होता है की कहीं ये  system हमारे सभी भावनाओं को दबा ना दें। सिर्फ इसी इसी डर से हम अपनी बची खुची इच्छाएँ भी दबा देते हैं। हम भूल जाते हैं की इस व्यवस्था की एक एक कड़ी हमारी चुनी हुई है। इसकी एक एक नीव हमारी मजबूती और योगदान को दिखाती है न की हमारी कमजोरी और असहाय हालत को।
हम भूल गए हैं की हमने ये कही सुनी आज़ादी कैसे, किन मुश्किलों में पाई है। इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। हमें आज़ादी मिली ही उपहार में है। हमने कहाँ किसी नेहरु गाँधी को सुना है। हम तो ना थे 1947 की उस पाकिस्तान से आने वाली ट्रेन में जिसमे सैकड़ो लोग मारे गए थे। उन दंगो में हमारे मकान और दुकानें नहीं जलाई गई थी।
भईया.. उपहार तो हमें आज भी बखूबी याद है, बस उपहार देने वालों को भूल गए हैं। ज्यादा नहीं बस थोडा सा। और उपहार की कीमत थोड़ी पूछी जाती है देने वालों से. सो हमने भी कभी ये जानने की गुस्ताखी ना की। इसमें गलत तो कुछ ना था।
हमारे ऐसे होने का एक बड़ा कारण ये है की हम आज़ादी संभाल नहीं पा रहे हैं। लेकिन ये बात हम कभी नहीं मानेंगे। हम कभी नहीं मानेंगे की हम आज भी अंदर से गुलाम है। गुलाम अपने ही लोगों के हाथों। अपनी ही भावनाओं के हाथो। हम आज अपने सपनो के पीछे नहीं भागते। हम किसी और के पीछे भागते हैं जो किसी और के पीछे भागता है उसके सपने पूरे करने के लिए। क्यूंकि हम अपने पसंद का काम सिर्फ इसलिए नहीं करते क्यूंकि किसी अनजान बन्दे ने हमसे कभी कह दिया था की ये काम बेकार है, या सामाजिक रूप से तिरस्कृत। ये वही लोग होते हैं जो समाज में समानता की बात करते हैं। क्यूंकि हम उसी भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हैं जिसे पता भी नहीं की उन्हें चाहिए क्या। जो रोज सुबह जगता है और हफ्ते के पांच दिन किसी और देश की दिक्कतों और समस्यायों  को एक फ़ोन पर सुलझाता है।
हम अपनी ताकत भूल रहे हैं। हमे इस बात का एकसास नहीं है की जो इंसान फोन पर दुसरे मुल्क की दिक्कतों का निवारण कर रहा है वो व्यक्तिगत रूप से इस देश की तरक्की में कितना योगदान दे सकता है।
हमें देश की तरक्की में अपनी हिस्सेदारी पहचानने की ज़रुरत है। और इसमें अपना योगदान देने की भी। हमे खुद को इस बात का एहसास करवाने की ज़रुरत है की संवैधानिक, सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता में क्या अंतर है। और इन तीनो के बिना किस तरह से हमारी आजादी बस नाम मात्र है।
dependent होकर अपने आप को indepentent कहना और अपने ही जैसे दुसरे dependents को इस भ्रम में रखना मुझे नहीं लगता हमारे लिए ज्यादा हितकर होगा।
दो स्वतंत्रताएं तो शायद हमें हमारे पूर्वजों ने दे दी है। बाकी सिर्फ मानसिक स्वतंत्रता है। उम्मीद करूंगा हमें जल्द ही वो भी हासिल हो। आमीन।।
Happy brthday independents...

Friday, 9 August 2013

शायद कल

जब दिल्ली में कांड हुआ तब मैं वहां पर ही था. आप भी सोच में पड़ गए होंगे की भला किस कांड की बात कर गया मैं.एक तो हुआ नहीं है वहां. रोज नए मसाले के साथ वहां की मीडिया हमारे सामने हाज़िर रहती है. इतना मत सोचिए जनाब .. आप किसी भी केस की पहले, साथ और बाद के हालात को ले सकते हैं.

हम इंजीनियरिंग स्टुडेंट्स को अक्सर मेस में सड़ा खाना ही नसीब होता है. और खास कर दिल्ली जैसे शहर में तो रोज बाहर खाना हम जैसे afford  भी नहीं कर पाते. ऐसा नहीं है की हमारे घर वाले पैसे नहीं देते हमें. वो तो बस ऐयाशियों में उड़ जाते हैं. सो हम अक्सर रात को खाने के बाद दिल्ली मेट्रो में कुछ ठंढी हवा खाने और आँखों को सुकून दिलाने निकल पड़ते. भईया दिल्ली है ये... यहाँ रात आठ बजे भी रौनक अपने सातवें आसमान पर होती है.

रात में अपने assignment  के बोझ तले दबा ये इंजिनियर जब सुबह कुछ देर से उठा तो पूरे हॉस्टल का माहौल कुछ बदला सा था. ऐसा लग रहा था की किसी exam  का रिजल्ट अचानक से आ गया हो. उन कुछ मिनटों में मेरे ऊपर क्या गुज़री होगी ये शायद आपको बताने की ज़रूरत नहीं है.

मैं बहोत कुछ समझ पाता तबतक एक बंदा एक न्यूज़ पेपर का front पेज लेकर मेरे पास आया. मैं पढ़ पाता तबतक उसने सारी कहानी एक सांस में सुना दी. उस लड़की के बारे में, जो 10  दिन तक मीडिया की TRP बढा कर इस दुनिया से जाने वाली थी. और उन इंसानों के बारे में भी जो जाने किस नस्ल के थे. शायद इंसान भी ना हों. क्या पता.

करीब आधा घंटा इसपर देने के बाद मैं कॉलेज के लिए निकला. वहां भी यही हाल. लंच पर भी. सब की जबान पर एक ही बात थी. आज लोगों में गम था गुस्सा था. सभी इंडिया गेट जाना चाहते थे. सभी अपना आक्रोश ज़ाहिर करना चाहते थे. लेकिन आज लोग भटके हुए थे. डरे हुए. उन्हें ये समझ नहीं आरहा था की गुस्सा किसपर उतारें. हमारी व्यवस्था पर , हमारे समाज पर या हमारे लड़के लड़कियों पर. और सबने गुस्सा उतरा. किसी एक पर नहीं.  सभी पर उतरा.

लेकिन
सवाल अभी भी वही था... सामाजिक उत्पीडन तो हुआ था. लड़कियों का और लड़कों का. वो भले ही शारीरिक हो या मानसिक. लड़कियाँ अब रात में अपने घरों से निकलने से डरने लगीं थी. वो अपने साथ के पुरुषों से घबराने लगी थीं. लड़के अब किसी लड़की को देखने से पहले सोचते थे. किसी हमशक्ल के धोखे में अब कोई लड़का किसी लड़की को नाम से नहीं पुकारता था. बाप अपनी बेटी को दिल्ली से बाहर पढाना चाहते थे. जिनकी बेटियां पहले से दिल्ली में थीं उनके डॉक्टरों की कमाई उनके blood pressure की तरह बढ़ने लगे थे. लड़के किसी अनजान लड़की की मदद करने से घबराने लगे थे. उन चौपालों पर अब लड़कियों की बातें नहीं हुआ करती. अब कोई 'देख भाभी आज पीले सूट में आई हैं' नहीं कहता था. तेरी-वाली मेरी-वाली पर शर्तें नहीं लगती अब.  Ladies  कम्पार्टमेंट में कोई मजनू किसी का पीछा करते नहीं घुसता था. अब हमने भी खाने के बाद ठंढी हवा खाने और आँखों को सुकून दिलाने की अपनी आदत को खत्म कर दिया था. दिल्ली में रौनक तो थी लेकिन डरी, सहमी और असहाय.

व्यंग लिखने की सोचा था ..लेकिन लिखा नहीं गया ..शायद ठंढी हवा खाने की आदत अभी पूरी तरह गई नहीं. शायद ये निगाहें अभी भी रात के आठ बजे दिल्ली के मेट्रो में बेबाक, बेख़ौफ़ और बिंदास रौनकों के उम्मीद में हैं. शायद अभी हमने उमीदें रखनी खत्म नहीं की है. शायद ...