Friday, 4 July 2014
केसरी side of wall
Monday, 16 June 2014
||| आधार |||
ठोष हृदए को विचार आने में क्या कोई प्रतिबंध है,
जीवंत हुँ तो रखता हुँ अपना मंतव्य हर कहीं,
इंसान बनने की राह पे बात करता हुँ जो है सही...
दिल लगाने पे भी अक्सर होती है बहस यहाँ,
बातें हैं बेबाक परन्तु नियत तो है सहज कहाँ,
देखती हैं ये आँखे और सुनती है किस्सा-ए-प्रज्ञा,
जरुरत नहीं इसे दिल, ना ही किसी टूट की आज्ञा...
अगले छंद में करता हुँ बयान अपने दर्दनाक लिखने का,
समझो तो तुम भी प्रत्यन करना अपने ना बिकने का...
अपने समाज की संरचना बड़ी कठोर और कुछ यूँ,
पीकर वाहन चलाना मना तो बार में पार्किंग है क्यों,
बलात्कार के मामले हर दिन मौसम के हाल के माफिक,
इसको रोकने का उपाय करो इसकी चर्चा करते हो क्यों ||

Saturday, 18 January 2014
Gud-marning-दीदी
Tuesday, 5 November 2013
उफ्फ्फ...तुम्हारे Opinions !
अपूर्व को इंडिया पाकिस्तान के मैच के बाद इतना गाली देते हुए आज देख रहा हूँ। मैंने उसे कहा भी की भईया इतनी बड़ी बात भी क्या हो गई। कौन सी दुनिया उजड़ गई आपकी। एक जीन्स ही तो है जो दूकानदार ने खराब दे दी है। इतना क्या स्यापा पाना इसपर। उसने जिस तरह से मुझे देखा मुझे अन्दर से महसूस हुआ की अगर बन्दे को इस वक़्त एक straw मिल जाता तो वो पक्का मेरा खून ही पी जाता। और उस दिन लगभग सारे हॉस्टल को ये बात पता चल गई की Levi's की जीन्स अगर बुरी नहीं है तो अच्छी भी नहीं है। इस तरह से एक बन्दे के सिर्फ एक जीन्स पर एक छोटी सी opinion की वजह से , ये कुछ सौ लोगों के दिमाग में levi's store में कदम रखने से पहले एक बार घंटी तो ज़रूर बजेगी।
ये सिर्फ एक जीन्स की बात नहीं है। जिंदगी की हर छोटी चीज़ जो हमसे जुडी है हम उसपर जाने अनजाने एक opinion ज़रूर बनाते हैं। और न सिर्फ ये opinion बनाते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों के साथ अपने विचार और experiences भी बाँटते हैं।
हम dominoes गए। वहां का खाना अच्छा या बुरा। हम अपना opinion रखते हैं।
कोई नया mall खुला शहर में। पिछले वाले से उसका comparison । हम अपना opinion रखते हैं।
मैंने नया samsung फोन लिया। बहोत गर्म होजाता है। कुह अच्छे features भी हैं। हम अपना opinion रखते हैं।
एक नयी फिल्म देखी। गाने कुछ ज्यादा ही थे। हम अपना opinion रखते हैं।
इंसानों का एक basic और अनुवांशिक nature होता है opinion बनाना। और न सिर्फ बनाना बल्कि उसे दूसरों के सामने express करना। और ये शर्मिंदा होने की बात नहीं है। बल्कि ये तो प्रमाण है की आप इंसान हैं।
ये ही opinions जब एक समूह में लिए और बनाये जाते हैं तो ये trend का रूप ले लेती है और फिर ना ही सिर्फ social बल्कि commercial और economical रूप से वर्चस्व बनाये हुए organisations को भी अपने सबसे सूक्ष्म और बेसिक समूह के हित में काम करने को मजबूर कर देती है। और आपको जानकर थोडा आश्चर्य हो सकता है लेकिन ये सूक्ष्म और बेसिक समूह कोई और नहीं हम खुद हैं।
यही वजह है की आम लोगों के opinion बनाने से बहोत से "लोगों" को डर लगता है। ये वो लोग हैं जो market में पकड़ बना चुके होते हैं और व्यावहारिक स्तर पर profit कमाना ही जिनका उद्देश्य रह गया है। और अब इन्हें अपनी गिरती value की वजह से अपने सर्विस और कीमतों में सुधार लाना होगा जिससे अंत में फायदा उस सूक्ष्म समूह को ही होगा जो हमसे बनती है।
इसीलिए opinions या तो अच्छे हों या बुरे। मीठे हों या कडवे। आप उसपर ban या रोक नहीं लगा सकते। और अगर आप या कोई राजनितिक पार्टी ऐसा करने की कोशिश करते हैं तो दो ही बातें हो सकती हैं।
1) या तो आप उस निचले और सूक्ष्म स्तर, जो की हम आम आदमी हैं, की कोई चिंता नहीं करते।
2) या आप डर गए हैं।
इसलिए अपनी बात रखिये और इंसान होने का प्रमाण दीजिये। एक ऐसा इन्सान जो ना सिर्फ जगा है बल्कि चौकन्ना भी है। जो सिर्फ विचार बनाता नहीं बल्कि उसको व्यक्त करने का साहस और हुनर दोनों रखता है। ऐसा इंसान जो अपने पूर्वजों से एक कदम आगे रहा है। जो evolution की सीढ़ी में आगे जाने को तैयार है। हम और आप। फैसला कोई भी हो.. आप अपना opinion देंगे... और उसी का मुझे इंतज़ार भी रहेगा हमेशा की तरह।
Thursday, 1 August 2013
पंच.नामा
अच्छा अच्छा रोइए मत. आपको एक खुफिया सरकारी दांव बताता हूं. हमारी कर्मठ सरकार ने प्लेटफोर्म टिकेट की कीमत भी तीन रूपए से बढ़ा कर पांच कर दिया है. अब भी नहीं समझे !!! बहुत ही मूरख हैं आप तो. हम ही बता देते हैं आपको. पांच रूपए का प्लेटफोर्म टिकेट लीजिए और स्टेशन पर जाकर भीख मांगिये. अरे ... संभालिए ज़रा ... कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे हैं की मेरा दिमाग तो नहीं खराब होगया है. इस तरह का काम कौन करता है भला. तो मालिक एक बात बता दूँ आपको. या तो आप अपनी इज्जत ही देख लीजिए या अपनी गरीबी ही. हमारे देश में गरीबी और इज्ज़त जैसे शब्द एक ही लाइन में कभी इस्तेमाल नहीं किए जाते हैं. हमारे राजनेता इसी बात को अब खुले आम कह रहे हैं तो आपके सीने पर सांप क्यूँ रेंग रहा है. अब आप उन्हें ही ले लीजिए वो तो गरीब न होते हुए भी बेइज्जतदार लोग हैं. तो हम जो उन्हें चुनते हैं और हमपर राज करने देते हैं, उनके इज्ज़तदार होने की बात आप सोच भी कैसे सकते हैं?
और इन राजनेताओं को भी काफी वक्त तक समझ नहीं आया की ये लोग जिन्होंने आज तक इस बात पर सवाल नही उठाया की 250 रूपए में महीना चलाने वालों को BPL के नीचे रखा गया और 251 रूपए मिलते ही वो अमीरों की category में कैसे आगये, वो आज पांच रूपए के लिए बवाल कर रहे हैं. इसका जवाब ढूँढते ढूंढते हमारे महापुरुषों की सेना को एक बहोत ही बड़े धर्म का पता चला. क्रिकेट...जी हाँ ..चौंकिए मत... उन्होंने न सिर्फ धर्म की खोज की बल्कि इससे प्राप्त परम ज्ञान का इस्तेमाल भी बखूबी किया. उन्होंने ये notice किया की जब IPL के matches होते हैं तो लोगों को देश दुनिया से कोई मतलब नहीं होता. जब उत्तराखंड में बाढ़ जैसी भयावह प्राकृतिक आपदा आने पर लोग अपनी सीटों से नहीं उठे तो पडोसी के थाली में खाना आरहा है या नहीं उससे उन्हें क्या फर्क पड़ने वाला था. इसी खोज का पेहला धमाका था पांच रूपए. इतने innovative राजनेता आपको किसी और देश में मिलेंगे क्या?
और आपको पता भी है , इन बेचारे राजनेताओं को संसद और राज्य सभा में 2.50 रूपए मात्र में एक थाली खाने को मिलता है.और इसके बावजूद आपके लिए इन्होने पांच रूपए deadline रखा. इतने में तो आप खुद भी खाएंगे और गर्लफ्रेंड को भी खुश रखेंगे. ये प्यारे नेता दिलों के इतने साफ हैं .और आप हैं की बस बुराई करते रहते हैं.
चलिए मुझे थोड़ी सामजिक अपच होती जारही है सो मैं कुछ खाऊंगा तो नहीं लेकिन इस ऐतिहासिक पांच रूपए का इस्तेमाल मैं एयरटेल के पांच वीडियो देखने में ज़रूर करूँगा. आप भी सोचिए की इस अनमोल पांच रूपए से आप क्या क्या कर सकते हैं. मैं जरा टहल कर आता हूं.

