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Friday, 18 July 2014

सवाली ख़ुशी

स्टडी के हिसाब से एक चार साल का बच्चा दिन में करीब 400 बार हँसता है जबकि एक वयस्क (अगर आप ये पढ़ रहें हैं तो ज़नाब आप कम से कम वयस्क तो हैं ही ) करीब 15 बार . जी हाँ इसमें उस तरीका का भी हँसना है जिसे आप पागलों की तरह हँसना कहते हैं . आपके स्ट्रेस , आपका काम, आपकी priority, आप कारण कोई भी दें लेकिन ये सच है की आप हँसना भूल गए हैं.
पहले तो आप इस बात को मानते नहीं हैं. और जब मैं (पता नहीं क्यूँ ) आप पर थोडा जोर डालता हूँ तो कई बार आप किसी का नाम लेलेते हैं, किसी इंसान का, किसी चीज़ का, किसी घटना का, या कई बार "तुम नहीं समझोगे यार !!!" जैसी बुद्धिजीवियों वाले जवाब दे देते हैं.

मैंने बहोत लोगों से इस बारे में गुफ्तगुं की और मुझे बहुत से और बहुत ही अलग से (यकीन मानिए, कुछ तो यकीन ना करने की इन्तहां तक अजीब थे) कारण सुनने को मिले.

जो मैंने पाया वो ये था की हर किसी को किसी न किसी चीज़ या इंसान या कंडीशन से दिक्कत है. और वो उसके ना खुश होने का कारण है. लेकिन एक चीज़, एक कारण  जो सभी में एक जैसे थे,जिसे किसी ने नहीं कहा की ये उनके खुश ना होने का कारण है..और वो थे वो खुद.

एक इन्सान ने ये नहीं कहा की वो खुश नहीं हैं क्यूंकि वो खुद नहीं चाहता. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि वो उस जीव या निर्जीव से कुछ ज्यादा ही जुड़ गया है और आगे नहीं बढ़ रहा. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि उसने अपनी ख़ुशी खुद की जगह किसी तोते में बंद कर रखी है. वो तोता जो ना तो अब आपका है और ना ही आपके लिए.


लेकिन आप ये मानना नहीं चाहते, क्यूंकि आपक्को तो बस उस तोते से लगाव था. वो लगाव जो अब जिद्द बन गई है आपकी. जिद्द उसे वापस पाने की. और उस सवाल की , की कैसे आपका प्यारा तोता आपका नहीं है. आप अपनी जिद्द में इतने जकड जाते हैं की आपको इस सवाल के जवाब से अब मतलब नहीं होता..आपको बस ये सवाल पूछना होता है..ये सवाल जिसे सुनने वाला कोई नहीं होता और आप झुंझला जाते हैं और खुश होना आपको बेईमानी सी लगने लगती है. आपकी स्थिति एक गाडी के पीछे भागते कुत्ते की तरह हो जाती है (घबराइए नहीं मैं आपको कुत्ता नहीं कह रहा ) जो आती जाती हर गाडी के पीछे भागता तो है, लेकिन उसके रुकने के बाद समझ नहीं पाता की क्या करें. और वो ये बार बार करता है.

आप तबतक नहीं खुश रह रकते जबतक आप खुद को ये नहीं मानने पर मजबूर कर देते (मजबूर इसलिए क्यूंकि अबतक आप बात के भूत से लात के भूत में बदल चुके हैं ) की आप के पास ही आपकी ख़ुशी का राज़ है.. राज़ जो बहुत ही आसान है. आपको अपनी ख़ुशी किसी तोते के अन्दर नहीं रखनी है. उसे आपको खुद में संजोये रखना है. आपको ये समझना होगा की उस गाड़ी की रफ़्तार आपकी ख़ुशी पर नहीं टिकी है. फिर आप उस गाडी के पीछे (जी हाँ उस कुत्ते की तरह )क्यूँ भाग रहे हैं.

फिर कहीं से सवाल उठता है हम उस "ख़ुशी" (हाँ भाई ..जिसे हम अभी भी ख़ुशी मान रहे हैं) के पीछे जाना छोड़ भी देते हैं तो ससुरी इस बेरहम दुनियां में अगली ख़ुशी कहाँ से ढूंढ कर लाएं... इसका जवाब किसी बड़ी सी चीज़ में नहीं छुपा है. इसका जवाब तो उन सभी छोटी चीज़ों में है जिसपर हमने कभी ध्यान नहीं दिया.

हमारी ख़ुशी उस बेपरवाह ठहाकों में है जो अपने दोस्तों के साथ बेपरवाह लगाया करते थे.
हमारी ख़ुशी उन दो छिछोरी लाइनों में है जो किसी डायरी में दबी पड़ी है.
हमारी ख़ुशी उन सफ़ेद पन्नों के बेढंगे रंगों में है जो बक्से के एक कोने में बंद है.
हमारी ख़ुशी उन पुराने सिक्कों में है जो बचपन में इकठे करते हुए नए नोटों में सिमट गई है.
हमारी ख़ुशी उन घर की बनी मठरियों में है जो पिज़्ज़ा के खाली डब्बों के साथ घर के कोने में भरी पड़ी है.
हमारी खुशी उस खुली  छत पर है जिसे हम कमरों की आज़ादी में बंद कर आये हैं.
हमारी ख़ुशी उस चुक्कड़ की चाय में है जो hygiene के नाम पर प्लास्टिक के कपों में पड़ी है.
हमारी ख़ुशी हममें है जिसे हम दूसरों की आँखों में खोजते आए हैं.
हमारी ख़ुशी उन छोटी छोटी आदतों में है जिन्हें अपनी इच्छाओं के आड़ में बदल डाली है.
हमारी ख़ुशी इस सवाल में नहीं है की हम खुश क्यूँ नहीं हैं बल्कि इसके जवाब में है की हम पहले जितने खुश क्यूँ नहीं हैं...हमारी ख़ुशी किन्ही जवाबों में नहीं ..बल्कि उन सवालों में है जो हम खुद से करना नहीं चाहते...हमारी ख़ुशी हममे है...
 (आप तो थोड़े भावुक हो गए )

हाँ तो आप कुछ सवाल कर रहे थे!!! नहीं ?? कोई नहीं ?? अच्छा...अच्छा... वक़्त चाहिए आपको... जी हाँ ..लीजिये  लीजिये...वक़्त तो आपही का है.


Thursday, 14 November 2013

नयी फटी शर्ट

रोज़ की तरह आज भी सुबह 6 बजे अलार्म की आवाज़ ने मुर्गे का काम आसान करते हुए मुझे हौले से जगाया. हाँ सच में. और कसम से गुस्सा तो मुझे आया ही नहीं. आता भी क्यूँ रोज़ का काम है उस बेचारे का. मैं बस उठा और "बहोत ही अच्छे मन से" बाथरूम की ओर तेज़ी से बढ़ा. मुझे अगर कोई सुबह सुबह बाथरूम की ओर भागता देख लेता तो उसे कारगिल पर सीमा की ओर भागते सैनिक की याद ज़रूर आ जाती.

लेकिन आज कुछ अलग हुआ. मैं बाथरूम तक नहीं पंहुच पाया. मेरे कदम बाहर से आ रही एक छोटी सी किरण ने रोक दी. एक छोटी सी रौशनी जो खिड़की के कोने से सीधे मेरे table पर आरही थी. मैंने अपने अन्दर के भाई-देर-हो-रही-है वाले इंसान को थोडा आराम दिया और खिड़की की ओर बढ़ा. खिड़की खुलते ही एक ठंढा सा हवा का झोंका मेरे चेहरे पर  पड़ा. ना बहोत खुश्क और ना ही नम, एकदम नपा तुला, सौंधी महक लिए वो ठंढा झोंका जो सूरज की चमक और गर्मी में मिलकर एक अलग सा एह्साह दे रहा था, सीधे मेरे चेहरे पर पड़ रहा था. मैंने आँखें बंद की और उस नए से एहसास  से खुद को वाकिफ कराने लगा.

लेकिन एक मिनट ....ये एहसास, ये सुकून, ये हवा कुछ जानी पहचानी सी लगी... कुछ अपनापन लिए.. किसी पुराने दोस्त की तरह. एक ऐसा एहसास जिसकी आगोश में आकर कोई परेशानी, कोई मुश्किल बस एक अफवाह से ज्यादा होने की जुर्रत नहीं करते. मेरे कानों में एक आवाज़ पड़ी - 'भाई !!! जल्दी उठ, सन्डे हैं, सात बज गए हैं, "रंगोली" के गाने छोड़ने का सोचा है क्या.' मेरी आँख एक ही आवाज़ में खुली और दो मिनट से कम वक़्त में मैं टीवी के सामने आँख फाड़े बैठा था. और पांच मिनट में मेरे सामने मेरे-सन्डे स्पेशल ब्रेड रोल और चाय थे. और पीछे से चिल्लाती माँ की आवाज़ " ठंड शुरू हो गई है कम्बल में घुसो ". उस कम्बल की गर्मी में calories और cholesterol वाले ब्रेड रोल का लुत्फ़, किशोर और मुकेश के पुराने गाने सुनते हुए लेने के बाद बारी थी सारे गमलों को पानी देने की. विश्वास करिए उन गमलों में रोबिन-हुड से लेकर गुलिवर तक की कहानियों के सेट बन चुके होते थे. ये कहानियां तब तक चलती रहतीं जबतक रोबिन-हुड और गुलिवर के बीच झगडे न शुरू हो जाते और माँ उनकी जगह हमारे पीछे झाड़ू लेकर भागती नज़र ना आने लगतीं. वैसे ये हाल कैरेम और लूडो के घंटों चलते matches के बाद भी देखने को मिल जाते थे जब नियम बनाते भी हम ही थे और तोड़ते भी. मोहल्ले में हो रहे क्रिकेट टूर्नामेंट में आप तभी जा सकते थे जब माँ किसी काम में इतनी व्यस्त हों की आप के घर पर ना होने से पैदा हुई शांति उनके परेशान होने का कारण ना बन जाए. ये एक आत्मघाती विस्फोट की तरह होता था जिसका detonation आपके लौटने के बाद आपके कारनामे और फटी हुई शर्ट खुद करती थी. उफ्.. तब तो गला फाड़ फाड़ कर रोने में भी शर्म नहीं आती थी.


मैंने ऑंखें खोली. अब मेरे अन्दर कहीं जाने की जल्दी नहीं थी. कोई झुझलाहट नहीं थी. मैंने ऑफिस फ़ोन लगाया और अपने बहोत-बहोत बीमार होने की बात बताई. लेकिन मैं बीमार नहीं हूँ. कुछ वक़्त चाहता हूँ. अपने लिए , बहोत सालों बाद. मैं इस सुबह की किरण को इस हवा को समेटना चाहता हूँ जो शायद हमेशा से मेरे आसपास ही थीं. लेकिन उन्हें देखने की मैंने न कभी कोशिश की और न ही ज़रुरत समझी. मुझे कुछ पकोड़े बनाने हैं अपने लिए जिसे चाय की हर एक चुस्की के साथ एन्जॉय करना है. मुझे कुछ कॉल करने हैं, अपने पुराने दोस्तों को जिन्हें मैं इस बड़े शेहेर की भागदौड़ में उस अमरुद के पेड़ पर छोड़ आया हूँ. कुछ चिट्ठियां लिखनी हैं उन खडूस अंकलों को जिनकी खिड़कियाँ आज भी हमारी गेंदों की निशान संजोये हुए हैं. कुछ किशोर की चुलबुली आवाज़ सुननी है, कुछ मुकेश के उफ़... वो दर्द भरे नगमे गुनगुनाने हैं. कुछ पुराणी पिक्चर देखनी हैं. एक दिन इस newspaper का मजाक बनाना है, बिना खोले बड़ा सा प्लेन बनाना है. आज थोडा कमज़ोर होना है, उस आम के पेड़ से गिरना है. आज बेवजह रोना है, कुछ आंसू बहाने हैं. फिर बिना किसी टेंशन के छत पर टेहेलना है और फिर आसमान को बेवजह घूरते हुए सो जाना है.


बहोत कुछ करना है आज. वो सब जो शायद मैं करना भूल गया हूँ, जो हम करना भूल गए हैं. कुछ ब्रेक अपने सपनों के पीछे भागने से लेते हैं और एक दिन अपने अन्दर के बचपन को देते हैं.


Happy Children-in-everyone every-day

Monday, 28 October 2013

Boiled egg या Fried egg ??

आपको लग सकता है की ये क्या है. सवाल तो कभी ये था ही नहीं. सवाल तो हमारे बुजुर्ग हमेशा से ये पूछते आये हैं की पहले मुर्गी आयी या अंडा. आपको लग सकता है की मैं पागल तो नहीं हो गया !! शायद हाँ , शायद ना.
बात ऐसा है की मुझे बुजुर्गों वाले सवाल के जवाब से ज्यादा ख़ुशी मेरे इस सवाल के जवाब से मिलती है. और आप ऐसा मत सोचिये की ये सवाल मुझसे किसी नेशनल इंस्टिट्यूट के सेमीनार में पुछा गया था और उसके जवाब से मुझे नोबेल पुरस्कार मिलने वाला है, जो मैं इतना खुश हो रहा हूँ. ये सवाल तो मुझसे " तूफानी अंडा शॉप " के पप्पू भईया ने पुछा था. और मैंने बस प्यार से उन्हें कहा था " आज Boiled में ही समेट दे भाई !! " .


आप बिलकुल सही हैं. ना तो मैंने कुछ ऐतिहासिक काम किया है और ना ही कुछ ऐसा जिससे मुझे इतनी ख़ुशी होनी चाहिए. लेकिन फिर भी मैं खुश हूँ. खुश इसलिए भी क्यूंकि इस वक़्त मुर्गी और अंडे के बीच सदियों से चल आरही लड़ाई में जीत किसी की भी हो हमारे 'आज' पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. मैं एक ऐसी ख़ुशी के लिए जिसके होने ना होने की कोई गारेंटी भी नहीं के लिए अपनी छोटी सी ख़ुशी कुर्बान नहीं करना चाहता.


हम आज यही कर रहें हैं ..बड़ी खुशियाँ , बड़ी महत्वकांक्षा के पीछे भागते हुए छोटी खुशिया, छोटी ज़रूरतों पर हमारा ध्यान नहीं जाता. आपके लिए ये समझना बहोत ही ज़रूरी है की छोटे पड़ाव उतने ही ज़रूरी हैं जिनती एक बड़ी मंजिल.

ये छोटी छोटी खुशियों के पल हमारे लिए एक Atom के ऊपर एक छोटे से Photon energy pouch की तरह काम करती हैं. ऐसा एक छोटा सा pouch जो आपको stabilize भी कर सकते हैं और destabilize भी. और अजीब बात ये है की इस stable state में पहोचने के लिए आपको किसी बड़े एनर्जी पैकेट को पाकर ऊँचे लेवल पर जाने की भी ज़रुरत नहीं है. और अगर आप किसी ऊपर के लेवल पर पहोच भी जाते हैं तो भी आपको उन खुशियों को बांधे रखने के लिए इन छोटी छोटी खुशियों के photons को संजोये रखना होगा.

आज बड़े शहरों में बड़ी कंपनियों , MNCs के बुद्धिजीवी हमारे इन महत्वकान्छओं को काफी अच्छी तरह आँका है और इसका इस्तेमाल अपने फायदों के लिए हमारे ही खिलाफ किआ है. थोडा सा बोनस , थोड़े से तोहफे, थोड़े से वादों देकर वो हमसे ये छोटी छोटी खुशियों की झोली मांग लेते हैं और हम भी इसे बड़ी आसानी से दे देते हैं. इस छोटी झोली की बड़ी कीमत का अंदाज़ा हमें आगे चल कर होता है जब हम भीड़ में इतने आगे निकल जाते हैं की वापस आना मुश्किल हो जाता है.

बड़ी खुशियों के पीछे जाना बुरा नहीं है, बल्कि समाज के evolution के लिए ज़रूरी भी है. लेकिन इन छोटी खुशियों की कुर्बानी देकर नहीं. हम कहीं बड़े सवालों के जवाब की खोज में कहीं इतने व्यस्त ना हो जाएँ की छोटे सवाल आपसे मुंह ही मोड़ लें.

अब ये हमारे ऊपर है इस मुर्गी-अंडे के जवाब के वादे में क्या हम सामने रखे boiled egg और fried egg के option को ही खत्म कर देते हैं या मुर्गी को थोडा इंतज़ार करने को कह कर छोटी खुशियों को हज़म की शाजिश में लग जाते हैं. सवाल और जवाब हमेशा से आपके सामने ही था और आगे भी रहेगा , मुद्दा ये है की आप चुनते किसे हैं.

मैं भी किन चक्करों में पड़ गया... पप्पू यार !!! Boiled लगाया नहीं अभी तक....


Ps. Happy vacations ( if u have any )

Sunday, 7 July 2013

नटवर.king


"अरे यार.. ट्रेन को भी आज ही लेट होना था?"

 कहीं आप चौंक तो नहीं गए की उस लाइन को जिसे भारत में बोलना ही illegal कर देना चाहिए वो मैं इतने धड़ल्ले से कैसे बोल रहा हूँ. या कहीं आप ये तो नहीं सोच रहे की मैं अपने प्रिय जनो से मिलने के लिए इतना उत्साहित हूँ की ऐसी गुस्ताखी हो गई मुझसे. अरे!!! अगर आप कोई सुविचार बना रहें हों तो तनिक रुकीए जरा. बात कुछ ऐसी है की हमें कोई प्रियजनों की याद वाद नहीं आ रही इस वक़्त और न ही हमें कोई इमरजेंसी ही है.

बात तो ऐसी है की... एक मिनट. कहीं आप ढिंढोरा तो नहीं पीटने लगेंगे मेरी इस बात का. अजी पीट भी दें तो हमारी बला से. तो जनाब बात इतनी सी है की हमारे फ़ोन की बैटरी हो गई है ख़त्म और इसी वजह से हम अपनी सोशल नेटवर्किंग साईट इस्तेमाल ही नहीं कर पा रहे हैं. अब मैं मोतिहारी स्टेशन पर जब ट्रेन पहुंचेगी तो “enjoying tea in चुक्कड़ @motihari” कैसे लिख पाउँगा. वैसे चुक्कड़ को अंग्रेजी में कहते क्या है? चलिए छोडी, ये हमारा मुद्दा नहीं है. 
 हाँ हाँ मुझे पता है की आपको लग रहा होगा की मैं क्यूँ फालतू में इस छोटी सी बात पे स्यापा पाल रहा हूँ. लेकिन मालिक आपको नहीं पता की ये कितनी बड़ी दिक्कत है. इसे फील करने के लिए आपको भी सोशल नेटवर्किंग का चरसी होना पड़ेगा. ओफ्फो ..अरे चरसी मतलब वही बन्दा जिसे लत लग जाती है किसी चीज़ की तो जिन्दगी के साथ ही जाती है. जी हाँ वही चरसी. अब बताइए कर पाएंगे ऐसा. बड़ी मेहनत लगती है साहेब. हर जाने अनजाने इन्सान से जुड़े रहना, उसके लगभग हर हरकत पर नजर रखना. लगभग हर 8 या 8 से ज्यादा रेटिंग वाली photoes को लाइक करना. मूड अच्छा हो या बुरा हर सिचुएशन में बत्तीसी फाड़ कर स्माइल करना. ये कोई नौसिखुए के बस की बात थोड़े ही है. cool बने रहने के लिए अच्छी अच्छी फोटोएं डालनी पड़ती हैं, बड़ी बड़ी बातें करनी होती हैं. होते आप पूर्णिया में हैं और लोगों को convince करना पड़ता है की आप पेरिस से कम अच्छी जगह नहीं हैं.



आप middle aged लोगों को को दाल रोटी से फुर्सत मिले तब तो आप समझें ये बड़ी बड़ी बातें.चलिए छोडिये.



अच्छा आज पकड़ में आए हैं तो सुन ही लीजिये.. आपकी यही दिक्कत थी ना की आज की पीढ़ी में वो सामाजिक जुडाव नहीं रह गया जो पहले हुआ करता था, तो हम आपको बता दें हम लगभग हर वक़्त अपने दोस्तों से फ़ोन और सोशल नेटवर्किंग साइट्स के जरिये जुड़े रहते हैं. हमें हर बात की खबर रहती है की आज किसने क्या खाया, क्या पढ़ा, कहाँ घूमा वागैरेह वगैरह. वो अलग बात है की हमें इतनी व्यस्तता है की हम उनकी इन गतिविधियों में खुद शरीक नहीं हो पाते हैं. 

यार...दोस्त ही इतने हैं नेटवर्किंग साइट्स पर की अगर एक के साथ वक़्त गुज़ारने में फसे रहे तो सैकड़ो से बनी बनाई थोड़ी बहोत hi hello भी कम हो जाएगा..और वैसे भी लाइक तो किया ना, लोग तो उतना भी नहीं करते .. हाँ नी तो.


और तो और कल पिताजी ने तो हद्द ही मचा दी. कहते हैं की जाओ घर से बहार निकलो
, खुली हवा का मज़ा लो, पुराने दोस्तों के संग घूम आओ, क्या दिन भर कंप्यूटर के आगे खिटिर पिटिर करते रहते हो.. अब आप बताइए ये भी कोई बात हुई. इस AC की ठंढक छोड़कर उस धुल भरे रोड पर कौन घूमने जाता है अब. और जब सभी दोस्त मेरे सामने यहाँ एक ही जगह मिल ही रहे हैं तो भला भगवान् की सृजन इस कीमती शरीर को जोखिम में क्यूँ डाला जाए.



और यहाँ कमी क्या है. मैं आए दिन देश में हो रही परेशानियों पर जी भर कर अपनी भड़ास निकलता हूँ. भईया, वो जमाना गया जब लोग घर बैठे सिर्फ क्रिकेट जैसे खेलों पर अपनी राय प्रकट किया करते थे. आज तो हम राजनीती ,कानून, गरीबी और धर्म जैसे 'खेलों' पर भी अपनी बेबीक टिप्पणीयां करने से पहले कुछ नहीं सोचते. मैं आपको एक ट्रिक बताता हूँ, वैसे मैं सभी को ऐसे ट्रिक्स नहीं बताता लेकिन आप थोड़े अपने लगे तो बता रहा हूँ.. ट्रिक बहोत ही आसान है



ज़नाब ...

चेतना  छोडिये  अपनी  सो  चुके  मस्तिष्क के हिस्से में... मेरा मतलब है अचेतन वाले हिस्से में बस ये बात डाल लीजिए की राजनीती है तो गन्दी ही होगी ,कानून है तो बेबस ही होगी, गरीबी है तो बेकारी ही होगा और धर्म है तो लाचारी ही होगी. लीजिए बहोत बड़ा मर्म बता दिया आज हमने आपको, अब आप भी बड़े आसानी से सोशल नेटवर्किंग पर सभी के चहेते बन सकते हैं.



वैसे आप कुछ फर्जी एकाउंट्स/लोगों  से बचियेगा ..वो ऐसी ही ज्वलनशील चर्चाओं में आएँगे और आपसे बे सर पैर के सवाल करेंगे की आपको अगर इतनी चिंता है देश की तो बाहर निकलो,  देश को सुधारिए वगैरह वगैरह... ऐसे लोगों को तुरंत ब्लाक कर दीजिएगा. अरे कारण क्या पूछ रहे हैं आप... इसमें हम आपके गुरु हैं जितना कहा है उतना करिए.



कुछ हल्की बातें करें, आपको शिक्षा देते देते मेरे सर में दर्द हो गया.



पता है कई बार मुझे लगता है की सोशल नेटवर्किंग साइट्स मंदिर, मश्जिद, गुरुद्वारों और चर्च से भी पाक हैं.. आपको हंसी आ सकती है. लेकिन एक बार इसपर लोगों को confess करते देखेंगे तब आपकी ये सोच बदल जाएगी... कितनी दिक्कतें हैं लोगों के पास...यहाँ अपनी परेशानियाँ लोगों से बांटने से बड़ी तसल्ली मिलती होगी उनकी आत्मा को...
मैं तो हर बार ऐसे लोगों के स्टेटस पर लाइक कर के ही मानता हूँ...और कई बार तो मेरे एक लाइक करने से ये भले सोशल नेटवर्किंग वाले ग़रीब बच्चों को पैसे भी बंटते हैं...नहीं जनाब झूठ नहीं बोलूँगा खुद पैसे देते हुए तो नहीं देखा है लेकिन बड़े लोग हैं तो झूठ थोड़े ना बोलेंगे.




कभी कभी तो मुझे उन छोटे शहरों पर तरस आता है जो सोशल नेटवर्किंग से अछूते हैं..वो बेचारे कहाँ अपनी परेशानियों का हल पाते होंगे ???..
“PARENTS”
ये किसने लिखा यहाँ ...भाई इतना जान लो की तुम
cool तो कत्तई नहीं हो...ज़रा सामने तो आओ... ब्लाक होने से पहले अपनी शकल तो दिखा जाओ..