Wing Up

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Monday, 23 June 2014

||| जिद्दी हुँ पर कपटी नहीं... |||

असली सूरत दिखाऊ तो जिद्दी कहें सब, 
तो क्या सबकी खुशी को ढोंगी हो जाऊ अब, 
चेहरा अनेक देख के सोचता हुँ मैं भी कभी,
किसी ना किसी मोड़ क्यों टूट जाते हैं सभी...


इसी कश्मकश मे बडता चला गया हुँ मै,
अर्थ-खोज़ मे उडता चला गया हुँ मै,
नहीं सह सकता चाहे समझो कसूरवार जितना,
अपनी नज़रो मे उठा रहू क्या काफी है इत
ना...

जिद है मुझे और ख्वाईश भी है लडने की,
उम्मीद से भी ज़्यादा लत है झगडने की,
इस राह मे आए है ऐसे मुकाम कई मरतबा,
बन गया अटूट हिस्सा जिनका कोई न अर्थ था...


नहीं देख सकता अब ये नकली बनावटी लोग,
करतब करे अनेक पर मकसद सबका बस भोग,
बहोत हुआ अब बंद करो ये ढोंग स्वेत कृत्य का,
नादान नहीं सच्चे हैं वो जो टाल जाए ये छल ह्रदय का...

Saturday, 14 June 2014

||| प्रतिवाद |||

कभी पीता नहीं हुँ,
होश में फिर भी रहता नहीं मैं,

सपनो में खोया रहूँ हमेशा,
पर सोता भी कहाँ हुँ मैं,

सामने दिखती है मंज़िल धुंदली,
रुका हुआ हुँ पर चलता नहीं हुँ मैं,

आशाएं लिए लाखों इस जहाँ में,
मगर पल बचे ही नहीं यहाँ मेरे,

लोभ में प्यार के फिरता हुँ,
ऐतबार है नहीं रिश्तों पे मगर मुझे,

बेमोल सा फिरता हुँ हर कहीं,
हर लम्हा बिकता हुँ इसी शहर में मैं,

झुकना सीखा ही नहीं किसी मोड़ पे,
पर सर कटाने को डरता भी हुँ मैं,

जुबान पे एक ताला सा है,
पर चुप रहता नहीं हुँ मैं ||

Saturday, 18 January 2014

Gud-marning-दीदी

13. ये गिनती थी उन नर्सेज की जो उन 23 ICU मरीजों के बीच थीं. ये नंबर्स सुनने में जितने अजीब और बेढंगे थे उनसे जुड़ा मेरा experience उतना ही मजबूर और दिलचस्प था

ये हॉस्पिटल है. और यहाँ सभी परेशान, दुखी, tensed और exhausted हैं. जी हाँ .. एकदम वैसे ही जैसे हम उम्मीद करते हैंआप जागें हों या सोने की जुर्रत ही क्यूँ न कर रहे हों आप उस सन्नाटे से डर जाते हैं जिसकी खोज आपको सुबह या कई दिनों से थी. आप समझ नहीं रहे होते हैं की आप चाह क्या रहे हैं.

पहले दिन काफी भागमभाग और उतार चढ़ाव के व्यवहार के बाद आपका मन थोडा शांत होता है. आप थक चुके होते हैं, शरीर से और मन से भी. अब आप अपने चारो तरफ देखते हैं और पाते हैं की आप पर ही सभी की नज़र टिकी है. हर तरह की बेजान नज़रें.. शायद इतनी तरह की बेबसी जिसे खत्म करने के लिए शायद हमारे पास जड़ी बूटियों की कमी पड़ जाएं. ये ऐसी जगह जान पड़ती है जहाँ आपकी दिक्कतें सबसे कम जान पड़ती हैं... लेकिन इस समय आप अपनी परेशानी को दूसरों से कम आंकने की स्थिति में नहीं हैं...आपको थोडा असहज सा लगता है, लेकिन आपकी गाडी में इतनी जगह नहीं बची हुई है की आप उस असहजता के साथ सफ़र कर सकें. इससे बचने के लिए आप आँखें बंद करते हैं, इससे आपको काम भर का 'भ्रम' मिल जाता है की कोई आपको देख नहीं रहा है.

अरे ... ये हंसने की आवाज़ कहाँ से आपके कानों में पड़ी... वो भी इतनी तेज और बेबाक हंसी.. कौन है ये insensitive इंसान, जिसे इतनी भी तमीज नहीं की एक हॉस्पिटल में इंसान को कैसा बरताव करना चाहिए.. एक मिनट.. कहीं ऐसा तो नहीं की वो आपका मज़ाक बना रहा हो... हो भी सकता है, इंसान में इंसान की कमी तो आजकल होती ही जा रही है.

आप माथे पर एक सिकन लिए हडबडा कर उस प्लास्टिक की कुर्सी से उठते हैं और इधर उधर देखने लगते हैं. देखने लगते हैं की बस वो इंसान दिख जाए जिसने ऐसा किया और आप उससे इस 'जुर्रत' के लिए अपनी जबान गन्दी कर सकें.. आप इधर उधर थोड़ी देर देखते हैं लेकिन आपको वहां कुछ नर्स ( शायद कुछ से थोड़ी ज्यादा ) और आपके जैसे ही आँखें फाड़े कुछ लोग और भी दिखते हैं जो अपने साथ किसी अपने को लेकर यहाँ आये हुए हैं.

आपको ये समझने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता की ये ठहाके किसी और की नहीं बल्कि उन नर्सेज की हैं जो आपने सामने ही झुण्ड बना खड़ी हैं. वो आपके सामने खड़ी हैं और एक दुसरे के कानों में धीरे बोलने की ना-के-बराबर कोशिश करते हुए उनके हाथ सर्कस के किसी कलाकार की तरह दवाइयां छांटने और सिरिंज को बांटने में लगे हैं.

वो ऐसा कैसे कर सकते हैं. जी नहीं !!! ये सवाल आपके सामने के करतब बाज के लिए नहीं है, ये सवाल तो उस शख्स के लिए है जो आप पर शायद हंस रहा है. उस हंसोड़ के लिए है जो भावनाविहीन मालूम होता है. आपको अब उस इंसान से थोड़ी झुंझलाहट होने लगी है जो आपके यहाँ आने पर सबसे पहले आगे बढ़ कर आया था और अपने ऊपर सारी जिम्मेदारियां लेकर इतनी शिद्दत के साथ लग गया था. और अब वही नामुराद ऐसे निरलज्यों की तरह ठहाके लगा रहा है.

आप अभी इसी उहापोह में ही थे की तभी वहां कहीं से एक लम्बे कद की औरत जो शक्ल से ही चीफ-वार्डन लग रही थी आ जाती है. उन्हें अन्दर आता देख सारी नुर्स एक साथ शांत हो गई... चलो उन्हें ये एहसास तो है की जो वो कर रही हैं वो सही नहीं है.. आप अन्दर से थोडा खुश होते हैं... अच्छा हुआ ये आ गई..अब या तो ये खुद उनकी ये हरकत देख लेगी या मैं खुद ही उनकी इस कारस्तानी के बारे में बता दूंगा.

लेकिन ये क्या !!! सभी उस चेइफ-वार्डन की तरह तेजी से बढ़ रही हैं..और इस बार तो उनकी आवाज के साथ साथ उनके चेहरों पर भी चमक है.. सभी ने उनका हाथ पकड़ा और लगभग एक ही वक़्त में सभी के मुंह से निकला "गूड-मार्निंग- दीदी". और उन्होंने भी सभी का मुस्कुरा कर अभिवादन किया..."गूड मोर्निंग बहनों".. हाँ..यही शब्द हैं उनके. और इस बार उनकी आवाज़ पूरे वार्ड में गूँज गई. गूंजती भी क्यूँ ना, उन्होंने सारे "गूड मोर्निंग बहनों" को अपने अन्दर से descending-order में जो निकाला था.

आप अबतक जितना annoyed महसूस कर रहे थे अब उतना ही अजीब भी महसूस करने लगे हैं. आखिरकार ये लोग अपने काम के वक़्त ही तो गप्पें हांक रही थीं. लेकिन फिर भी इनके अन्दर दूसरों को छोडिये अपने सीनियर का भी डर नहीं है. आप इस सवाल को मन में लिए अपनी कुर्सी के बगल से लगे बेड पर पड़े हुए उस इंसान पर पड़ती है...आपको जो दिखता है वो एक सुकून भरा सुखद-आश्चर्य होता है. जिस इंसान को आप आधे घंटे पहले एक निर्जीव स्थिति में वहां लाये थे उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. एक नायब मुस्कान जो डॉक्टरों की की गई भविष्यवाणी से काफी पहले आ गई थी. एक मुस्कान जिसने आपके दिन भर के थकान को चुटकी में खत्म कर दिया था. लेकिन जरा ठेहेरिये ... उस मुस्कान का असली श्रेय किसे जाएगा... डॉक्टरों को ...अच्छी दवाइयों को या किन्ही और को .... किन्ही फूहड़ औरतों को जिनको शायद भगवन ने सबसे अच्छी हंसी से तो नहीं ही नवाजा है. 


शायद डॉक्टरों की भविष्यवाणी गलत इसलिए हो गई क्यूंकि उन्होंने दवाइयों की गिनती में कुछ ठहाकों की संख्या में कमी कर दी थी. ठहाकों की वो संख्या जो उन नर्सों को याद थीं और जिसे देने में उन्होंने कोई कंजूसी नहीं की. उस वक़्त शायद हमारे जैसे कई मरीजों को दवाइयों से ज्यादा माहौल की ज़रुरत थी, कुछ मुस्कराहट की ज़रुरत थी. वो मुस्कराहट  जिसकी यहाँ आपसे उम्मीद नहीं की जाती. इन ठहाकों के लिए ना तो इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है और  ना ही सैलरी. और इसके बावजूद उन्होंने अपने काम को पूरे शिद्दत से पूरा किया... आपने शायद फैसला करने में थोड़ी जल्दबाजी कर दी थी. लेकिन कोई बात नहीं ... अब आपकी बारी है... कुछ गंभीरता में कटौती करने की .... कुछ अनजाने चेहरों पर अनचाही मुस्कान बिखेरने की... कुछ बेपरवाह ठहाकों की... कुछ दफा judgmental ना होने की... कुछ दूसरों के काम को appreciate करने की...कुछ खुद के काम से दूसरों को ख़ुशी देने की ...  अब आपकी बारी है कुछ उमीदों पर खरा ना उतरने की... कोशिश कीजिये... इतना मुश्किल भी नहीं है. 

Monday, 28 October 2013

Boiled egg या Fried egg ??

आपको लग सकता है की ये क्या है. सवाल तो कभी ये था ही नहीं. सवाल तो हमारे बुजुर्ग हमेशा से ये पूछते आये हैं की पहले मुर्गी आयी या अंडा. आपको लग सकता है की मैं पागल तो नहीं हो गया !! शायद हाँ , शायद ना.
बात ऐसा है की मुझे बुजुर्गों वाले सवाल के जवाब से ज्यादा ख़ुशी मेरे इस सवाल के जवाब से मिलती है. और आप ऐसा मत सोचिये की ये सवाल मुझसे किसी नेशनल इंस्टिट्यूट के सेमीनार में पुछा गया था और उसके जवाब से मुझे नोबेल पुरस्कार मिलने वाला है, जो मैं इतना खुश हो रहा हूँ. ये सवाल तो मुझसे " तूफानी अंडा शॉप " के पप्पू भईया ने पुछा था. और मैंने बस प्यार से उन्हें कहा था " आज Boiled में ही समेट दे भाई !! " .


आप बिलकुल सही हैं. ना तो मैंने कुछ ऐतिहासिक काम किया है और ना ही कुछ ऐसा जिससे मुझे इतनी ख़ुशी होनी चाहिए. लेकिन फिर भी मैं खुश हूँ. खुश इसलिए भी क्यूंकि इस वक़्त मुर्गी और अंडे के बीच सदियों से चल आरही लड़ाई में जीत किसी की भी हो हमारे 'आज' पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. मैं एक ऐसी ख़ुशी के लिए जिसके होने ना होने की कोई गारेंटी भी नहीं के लिए अपनी छोटी सी ख़ुशी कुर्बान नहीं करना चाहता.


हम आज यही कर रहें हैं ..बड़ी खुशियाँ , बड़ी महत्वकांक्षा के पीछे भागते हुए छोटी खुशिया, छोटी ज़रूरतों पर हमारा ध्यान नहीं जाता. आपके लिए ये समझना बहोत ही ज़रूरी है की छोटे पड़ाव उतने ही ज़रूरी हैं जिनती एक बड़ी मंजिल.

ये छोटी छोटी खुशियों के पल हमारे लिए एक Atom के ऊपर एक छोटे से Photon energy pouch की तरह काम करती हैं. ऐसा एक छोटा सा pouch जो आपको stabilize भी कर सकते हैं और destabilize भी. और अजीब बात ये है की इस stable state में पहोचने के लिए आपको किसी बड़े एनर्जी पैकेट को पाकर ऊँचे लेवल पर जाने की भी ज़रुरत नहीं है. और अगर आप किसी ऊपर के लेवल पर पहोच भी जाते हैं तो भी आपको उन खुशियों को बांधे रखने के लिए इन छोटी छोटी खुशियों के photons को संजोये रखना होगा.

आज बड़े शहरों में बड़ी कंपनियों , MNCs के बुद्धिजीवी हमारे इन महत्वकान्छओं को काफी अच्छी तरह आँका है और इसका इस्तेमाल अपने फायदों के लिए हमारे ही खिलाफ किआ है. थोडा सा बोनस , थोड़े से तोहफे, थोड़े से वादों देकर वो हमसे ये छोटी छोटी खुशियों की झोली मांग लेते हैं और हम भी इसे बड़ी आसानी से दे देते हैं. इस छोटी झोली की बड़ी कीमत का अंदाज़ा हमें आगे चल कर होता है जब हम भीड़ में इतने आगे निकल जाते हैं की वापस आना मुश्किल हो जाता है.

बड़ी खुशियों के पीछे जाना बुरा नहीं है, बल्कि समाज के evolution के लिए ज़रूरी भी है. लेकिन इन छोटी खुशियों की कुर्बानी देकर नहीं. हम कहीं बड़े सवालों के जवाब की खोज में कहीं इतने व्यस्त ना हो जाएँ की छोटे सवाल आपसे मुंह ही मोड़ लें.

अब ये हमारे ऊपर है इस मुर्गी-अंडे के जवाब के वादे में क्या हम सामने रखे boiled egg और fried egg के option को ही खत्म कर देते हैं या मुर्गी को थोडा इंतज़ार करने को कह कर छोटी खुशियों को हज़म की शाजिश में लग जाते हैं. सवाल और जवाब हमेशा से आपके सामने ही था और आगे भी रहेगा , मुद्दा ये है की आप चुनते किसे हैं.

मैं भी किन चक्करों में पड़ गया... पप्पू यार !!! Boiled लगाया नहीं अभी तक....


Ps. Happy vacations ( if u have any )

Thursday, 15 August 2013

State of Independence

Independence day. एक ऐसा दिन जिसकी ख़ुशी हर एक भारतीय को होती है। कुछ को ज्यादा, कुछ को कम। कुछ अन्दर से खुश होते हैं तो कुछ बस दूसरों की ख़ुशी के लिए। कुछ इसे सुबह जल्दी जग कर मनाते हैं तो कुछ देर तक सो कर।
ख़ुशी हो भी क्यूँ ना, कम से कम एक दिन तो हमें मिलता है जिस दिन हम हर तरह से खुद को तस्सली दिला सकते हैं की भईया सच में हम आज़ाद हैं। वरना कहाँ इस बेरहम भाग दौड़ वाली जिंदगी में इस बात का एहसास हो पाता है। दिन भर देश के एक बड़े शहर के छोटे से कोने में बहोत ही तेजी से पूरी दुनिया से जोड़े रखने वाली मशीन के सामने बैठे रहने पर , कहाँ इस आज़ादी का लुत्फ़ उठा मिलता है।
इसमें कुछ गलत नहीं है। हमें पूरा हक है की हम जैसे चाहें वैसे अपनी स्वतंत्रता को enjoy  करें। बात बस इतनी सी है की क्या हमें पता है की हमें अपनी स्वतंत्रता का इस्तेमाल कैसे करना है या हम कैसे कर सकते हैं और फिर भी नहीं करते। हम आज भी इंतज़ार करते हैं की कोई आकर हमारी बात आगे रखे। कोई आए जो हमारी दिक्कतों और परेशानियों का solution ढूंढें। हमें कुछ बोलने, कुछ चित्रित करने,कुछ सोचने से पहले भी इस बात का डर होता है की कहीं ये  system हमारे सभी भावनाओं को दबा ना दें। सिर्फ इसी इसी डर से हम अपनी बची खुची इच्छाएँ भी दबा देते हैं। हम भूल जाते हैं की इस व्यवस्था की एक एक कड़ी हमारी चुनी हुई है। इसकी एक एक नीव हमारी मजबूती और योगदान को दिखाती है न की हमारी कमजोरी और असहाय हालत को।
हम भूल गए हैं की हमने ये कही सुनी आज़ादी कैसे, किन मुश्किलों में पाई है। इसमें हमारी कोई गलती नहीं है। हमें आज़ादी मिली ही उपहार में है। हमने कहाँ किसी नेहरु गाँधी को सुना है। हम तो ना थे 1947 की उस पाकिस्तान से आने वाली ट्रेन में जिसमे सैकड़ो लोग मारे गए थे। उन दंगो में हमारे मकान और दुकानें नहीं जलाई गई थी।
भईया.. उपहार तो हमें आज भी बखूबी याद है, बस उपहार देने वालों को भूल गए हैं। ज्यादा नहीं बस थोडा सा। और उपहार की कीमत थोड़ी पूछी जाती है देने वालों से. सो हमने भी कभी ये जानने की गुस्ताखी ना की। इसमें गलत तो कुछ ना था।
हमारे ऐसे होने का एक बड़ा कारण ये है की हम आज़ादी संभाल नहीं पा रहे हैं। लेकिन ये बात हम कभी नहीं मानेंगे। हम कभी नहीं मानेंगे की हम आज भी अंदर से गुलाम है। गुलाम अपने ही लोगों के हाथों। अपनी ही भावनाओं के हाथो। हम आज अपने सपनो के पीछे नहीं भागते। हम किसी और के पीछे भागते हैं जो किसी और के पीछे भागता है उसके सपने पूरे करने के लिए। क्यूंकि हम अपने पसंद का काम सिर्फ इसलिए नहीं करते क्यूंकि किसी अनजान बन्दे ने हमसे कभी कह दिया था की ये काम बेकार है, या सामाजिक रूप से तिरस्कृत। ये वही लोग होते हैं जो समाज में समानता की बात करते हैं। क्यूंकि हम उसी भीड़ का हिस्सा बनना चाहते हैं जिसे पता भी नहीं की उन्हें चाहिए क्या। जो रोज सुबह जगता है और हफ्ते के पांच दिन किसी और देश की दिक्कतों और समस्यायों  को एक फ़ोन पर सुलझाता है।
हम अपनी ताकत भूल रहे हैं। हमे इस बात का एकसास नहीं है की जो इंसान फोन पर दुसरे मुल्क की दिक्कतों का निवारण कर रहा है वो व्यक्तिगत रूप से इस देश की तरक्की में कितना योगदान दे सकता है।
हमें देश की तरक्की में अपनी हिस्सेदारी पहचानने की ज़रुरत है। और इसमें अपना योगदान देने की भी। हमे खुद को इस बात का एहसास करवाने की ज़रुरत है की संवैधानिक, सामाजिक और मानसिक स्वतंत्रता में क्या अंतर है। और इन तीनो के बिना किस तरह से हमारी आजादी बस नाम मात्र है।
dependent होकर अपने आप को indepentent कहना और अपने ही जैसे दुसरे dependents को इस भ्रम में रखना मुझे नहीं लगता हमारे लिए ज्यादा हितकर होगा।
दो स्वतंत्रताएं तो शायद हमें हमारे पूर्वजों ने दे दी है। बाकी सिर्फ मानसिक स्वतंत्रता है। उम्मीद करूंगा हमें जल्द ही वो भी हासिल हो। आमीन।।
Happy brthday independents...