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Sunday, 29 June 2014

एक बूँद थप्पड़

सबसे पहले तो एक काम करिए. एक थप्पड़ जडिये खुद को. नहीं नहीं सोचिये मत. आगे बढिए. एक थप्पड़. आपका आने वाला कल आपका आभारी होगा.
मैं आपको “आपकी जिंदगी दूसरों की जिंदगी से बेहतर है” पर लेक्चर नहीं देने वाला. क्यूँ !!! क्यूंकि ऐसा है नहीं. आप जिस जगह पर हैं, आप माने या ना मानें, वे आपके चुनाव ही हैं. चुनाव जो आपने अपनी जिंदगी के हर पड़ाव पर लिए. ये आप हैं जिन्होंने फैसले तो कर लिए लेकिन उनपर अमल करने पर आपने अपना सब कुछ दांव पर नहीं लगाया. आपको ना ही पाने की गहराई का एहसास है और न ही खोने का डर. अगर किसी बात का एह्साह है आपको तो इस बात का की कहीं आप उसे खो ना दें. लेकिन आप इसका कुछ करते नहीं. मैं बताता हूँ क्यूँ ...
क्यूंकि आप डरते हैं. डरते हैं अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने से. डरते हैं हारने से. और डरते हैं बदलाव से. बदलाव जो आपको आगे भी ले जा सकता है और पीछे भी. लेकिन आप ये रिस्क नहीं लेना चाहते. और आप रिस्क लें भी क्यूँ आप जिस जगह हैं वो भले ही जैसी भी हो आपको समाज में इज्ज़त तो देता है  (ब्वाहहहाहहाहा...),और आपके वो रिश्तेदार भी खुश रहते हैं जिनको आपकी बारहवी की रिजल्ट से लेकर आपकी शौक तक में दखल देना आपको बेहद पसंद था. आप उन्हें तो नाराज़ नहीं कर सकते ना.

जैसा मैंने पहले कहा था. एक थप्पड़. प्लीज.
एक थप्पड़ हर बार जब आप खुद को आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई ना कोई बहाना लेकर आ जाते हैं. क्यूंकि शायद एक दिन ये एक थप्पड़ कोई चमत्कार कर जाए और आपको ये समझ में आए की आप जो कर रहे हैं और आप जो करना चाहते हैं उसके बीच अगर कोई आ रहा है तो वो, सरप्राइज, आप ही हैं.


यहाँ पर ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिन्होंने असम (जी हाँ इसका मतलब ~non supporting / uneven ~ होता है मेरे अंग्रेजों) परिस्थितियों में खुद को साबित किया है. आप जब खुद का इस्तेमाल अपने उद्देश्य को पाने में करने का सोचते हैं तो आश्चर्य चकित करने वाले परिणाम सामने आते हैं. आपके पास कोई और option नहीं होता उस रस्ते पर चलने के सिवा. और उस रास्ते पर चलते हुए आपको एहसास होता है की तब आपको ये एकसास होता है की ये रास्ता भले ही आसान ना हो लेकिन दिन भर इस रास्ते पर चलने के बाद भी अगर आप के हाथों कुछ नहीं आता तो आप वापस नहीं लौटते हैं, आप वहीँ किसी पेड़ के नीचे इस उम्मीद और उत्साह के साथ लेट जाते हैं की कल आप आज से जल्दी जागेंगे और आज से थोडा ही सही लेकिन ज्यादा मेहनत करेंगे. और ये सफ़र धीरे धीरे आपको आपकी मंजिल के नज़दीक ले जाता है. 
इसलिए थप्पड़ मारिये. हर बार. खुद को. और थोडा सा हर उस इंसान को जिसने आपको घर जाने के लिए कहा.

अगली बार जब हम मिले तब या तो आप खुद के बनाये रास्तों पर चल रहे हों या आपके गाल लाल हों.
:)
So Good luck.
ps. अपने पहले थप्पड़ के बारे में ज़रूर बताएं.




Wednesday, 25 June 2014

||| दुखी हुँ अचेत नहीं... |||

जाते-जाते एक ऐहसान करते जा,
अपने सारे दर्द मेरे हिस्से भरते जा,
और कभी मेरी ख्वाइश का ज़िक्र ना करना,
अपनी खुशी में कभी मेरी फ़िक्र ना करना...

बहोत फ़ासले तय किये इस मुकाम पे आने को,
सहा है दर्द बहोत यहाँ सुकून न पाने को,
मौत की सेज़ भी सजी तो मौत लौटती बोली,
तू वक़्त ले थोड़ा और अपना दर्द बढ़ाने को...

दुःख और दर्द में अंतर आसान और इतना है,
दुःख में सिर्फ हार और दर्द में ही जितना है,
और दुःख में आते हैं विचार तो सच्चे हैं न,
क्युकि सफेदी मुश्किल और दाग अच्छे हैं न...

ये हुई दुःख-दर्द की घिसी-पिट्टी पुरानी बात,
अब है बारी करने की अर्थ की सायानी बात,
किसी भी दशा में हो बस खुशी बांटते रहो,
ना कर सको ये तो सिर्फ दुःख ही छांटते चलो...

और तेरे होने की खुशी भी संभाल ही थी,
तो तेरे जाने का गम उससे बड़ा तो नहीं,
हा मैं दुखी हूँ पर अचेत ना ही मक्कार यहाँ,
अधूरा हुँ और ना हो सकूंगा कभी साकार यहाँ...

Monday, 16 June 2014

||| आधार |||

दिल टूटने का लिखने से क्या सम्बन्ध है, 
ठोष हृदए को विचार आने में क्या कोई प्रतिबंध है, 
जीवंत हुँ तो रखता हुँ अपना मंतव्य हर कहीं, 
इंसान बनने की राह पे बात करता हुँ जो है सही...

दिल लगाने पे भी अक्सर होती है बहस यहाँ, 
बातें हैं बेबाक परन्तु नियत तो है सहज कहाँ, 
देखती हैं ये आँखे और सुनती है किस्सा-ए-प्रज्ञा, 
जरुरत नहीं इसे दिल, ना ही किसी टूट की आज्ञा...

अगले छंद में करता हुँ बयान अपने दर्दनाक लिखने का, 
समझो तो तुम भी प्रत्यन करना अपने ना बिकने का...

अपने समाज की संरचना बड़ी कठोर और कुछ यूँ, 
पीकर वाहन चलाना मना तो बार में पार्किंग है क्यों, 
बलात्कार के मामले हर दिन मौसम के हाल के माफिक, 
इसको रोकने का उपाय करो इसकी चर्चा करते हो क्यों ||

Saturday, 14 June 2014

||| प्रतिवाद |||

कभी पीता नहीं हुँ,
होश में फिर भी रहता नहीं मैं,

सपनो में खोया रहूँ हमेशा,
पर सोता भी कहाँ हुँ मैं,

सामने दिखती है मंज़िल धुंदली,
रुका हुआ हुँ पर चलता नहीं हुँ मैं,

आशाएं लिए लाखों इस जहाँ में,
मगर पल बचे ही नहीं यहाँ मेरे,

लोभ में प्यार के फिरता हुँ,
ऐतबार है नहीं रिश्तों पे मगर मुझे,

बेमोल सा फिरता हुँ हर कहीं,
हर लम्हा बिकता हुँ इसी शहर में मैं,

झुकना सीखा ही नहीं किसी मोड़ पे,
पर सर कटाने को डरता भी हुँ मैं,

जुबान पे एक ताला सा है,
पर चुप रहता नहीं हुँ मैं ||

Saturday, 18 January 2014

Gud-marning-दीदी

13. ये गिनती थी उन नर्सेज की जो उन 23 ICU मरीजों के बीच थीं. ये नंबर्स सुनने में जितने अजीब और बेढंगे थे उनसे जुड़ा मेरा experience उतना ही मजबूर और दिलचस्प था. 

ये हॉस्पिटल है. और यहाँ सभी परेशान, दुखी, tensed और exhausted हैं. जी हाँ .. एकदम वैसे ही जैसे हम उम्मीद करते हैं. आप जागें हों या सोने की जुर्रत ही क्यूँ न कर रहे हों आप उस सन्नाटे से डर जाते हैं जिसकी खोज आपको सुबह या कई दिनों से थी. आप समझ नहीं रहे होते हैं की आप चाह क्या रहे हैं.

पहले दिन काफी भागमभाग और उतार चढ़ाव के व्यवहार के बाद आपका मन थोडा शांत होता है. आप थक चुके होते हैं, शरीर से और मन से भी. अब आप अपने चारो तरफ देखते हैं और पाते हैं की आप पर ही सभी की नज़र टिकी है. हर तरह की बेजान नज़रें.. शायद इतनी तरह की बेबसी जिसे खत्म करने के लिए शायद हमारे पास जड़ी बूटियों की कमी पड़ जाएं. ये ऐसी जगह जान पड़ती है जहाँ आपकी दिक्कतें सबसे कम जान पड़ती हैं... लेकिन इस समय आप अपनी परेशानी को दूसरों से कम आंकने की स्थिति में नहीं हैं...आपको थोडा असहज सा लगता है, लेकिन आपकी गाडी में इतनी जगह नहीं बची हुई है की आप उस असहजता के साथ सफ़र कर सकें. इससे बचने के लिए आप आँखें बंद करते हैं, इससे आपको काम भर का 'भ्रम' मिल जाता है की कोई आपको देख नहीं रहा है.

अरे ... ये हंसने की आवाज़ कहाँ से आपके कानों में पड़ी... वो भी इतनी तेज और बेबाक हंसी.. कौन है ये insensitive इंसान, जिसे इतनी भी तमीज नहीं की एक हॉस्पिटल में इंसान को कैसा बरताव करना चाहिए.. एक मिनट.. कहीं ऐसा तो नहीं की वो आपका मज़ाक बना रहा हो... हो भी सकता है, इंसान में इंसान की कमी तो आजकल होती ही जा रही है.

आप माथे पर एक सिकन लिए हडबडा कर उस प्लास्टिक की कुर्सी से उठते हैं और इधर उधर देखने लगते हैं. देखने लगते हैं की बस वो इंसान दिख जाए जिसने ऐसा किया और आप उससे इस 'जुर्रत' के लिए अपनी जबान गन्दी कर सकें.. आप इधर उधर थोड़ी देर देखते हैं लेकिन आपको वहां कुछ नर्स ( शायद कुछ से थोड़ी ज्यादा ) और आपके जैसे ही आँखें फाड़े कुछ लोग और भी दिखते हैं जो अपने साथ किसी अपने को लेकर यहाँ आये हुए हैं.

आपको ये समझने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता की ये ठहाके किसी और की नहीं बल्कि उन नर्सेज की हैं जो आपने सामने ही झुण्ड बना खड़ी हैं. वो आपके सामने खड़ी हैं और एक दुसरे के कानों में धीरे बोलने की ना-के-बराबर कोशिश करते हुए उनके हाथ सर्कस के किसी कलाकार की तरह दवाइयां छांटने और सिरिंज को बांटने में लगे हैं.

वो ऐसा कैसे कर सकते हैं. जी नहीं !!! ये सवाल आपके सामने के करतब बाज के लिए नहीं है, ये सवाल तो उस शख्स के लिए है जो आप पर शायद हंस रहा है. उस हंसोड़ के लिए है जो भावनाविहीन मालूम होता है. आपको अब उस इंसान से थोड़ी झुंझलाहट होने लगी है जो आपके यहाँ आने पर सबसे पहले आगे बढ़ कर आया था और अपने ऊपर सारी जिम्मेदारियां लेकर इतनी शिद्दत के साथ लग गया था. और अब वही नामुराद ऐसे निरलज्यों की तरह ठहाके लगा रहा है.

आप अभी इसी उहापोह में ही थे की तभी वहां कहीं से एक लम्बे कद की औरत जो शक्ल से ही चीफ-वार्डन लग रही थी आ जाती है. उन्हें अन्दर आता देख सारी नुर्स एक साथ शांत हो गई... चलो उन्हें ये एहसास तो है की जो वो कर रही हैं वो सही नहीं है.. आप अन्दर से थोडा खुश होते हैं... अच्छा हुआ ये आ गई..अब या तो ये खुद उनकी ये हरकत देख लेगी या मैं खुद ही उनकी इस कारस्तानी के बारे में बता दूंगा.

लेकिन ये क्या !!! सभी उस चेइफ-वार्डन की तरह तेजी से बढ़ रही हैं..और इस बार तो उनकी आवाज के साथ साथ उनके चेहरों पर भी चमक है.. सभी ने उनका हाथ पकड़ा और लगभग एक ही वक़्त में सभी के मुंह से निकला "गूड-मार्निंग- दीदी". और उन्होंने भी सभी का मुस्कुरा कर अभिवादन किया..."गूड मोर्निंग बहनों".. हाँ..यही शब्द हैं उनके. और इस बार उनकी आवाज़ पूरे वार्ड में गूँज गई. गूंजती भी क्यूँ ना, उन्होंने सारे "गूड मोर्निंग बहनों" को अपने अन्दर से descending-order में जो निकाला था.

आप अबतक जितना annoyed महसूस कर रहे थे अब उतना ही अजीब भी महसूस करने लगे हैं. आखिरकार ये लोग अपने काम के वक़्त ही तो गप्पें हांक रही थीं. लेकिन फिर भी इनके अन्दर दूसरों को छोडिये अपने सीनियर का भी डर नहीं है. आप इस सवाल को मन में लिए अपनी कुर्सी के बगल से लगे बेड पर पड़े हुए उस इंसान पर पड़ती है...आपको जो दिखता है वो एक सुकून भरा सुखद-आश्चर्य होता है. जिस इंसान को आप आधे घंटे पहले एक निर्जीव स्थिति में वहां लाये थे उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. एक नायब मुस्कान जो डॉक्टरों की की गई भविष्यवाणी से काफी पहले आ गई थी. एक मुस्कान जिसने आपके दिन भर के थकान को चुटकी में खत्म कर दिया था. लेकिन जरा ठेहेरिये ... उस मुस्कान का असली श्रेय किसे जाएगा... डॉक्टरों को ...अच्छी दवाइयों को या किन्ही और को .... किन्ही फूहड़ औरतों को जिनको शायद भगवन ने सबसे अच्छी हंसी से तो नहीं ही नवाजा है. 


शायद डॉक्टरों की भविष्यवाणी गलत इसलिए हो गई क्यूंकि उन्होंने दवाइयों की गिनती में कुछ ठहाकों की संख्या में कमी कर दी थी. ठहाकों की वो संख्या जो उन नर्सों को याद थीं और जिसे देने में उन्होंने कोई कंजूसी नहीं की. उस वक़्त शायद हमारे जैसे कई मरीजों को दवाइयों से ज्यादा माहौल की ज़रुरत थी, कुछ मुस्कराहट की ज़रुरत थी. वो मुस्कराहट  जिसकी यहाँ आपसे उम्मीद नहीं की जाती. इन ठहाकों के लिए ना तो इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है और  ना ही सैलरी. और इसके बावजूद उन्होंने अपने काम को पूरे शिद्दत से पूरा किया... आपने शायद फैसला करने में थोड़ी जल्दबाजी कर दी थी. लेकिन कोई बात नहीं ... अब आपकी बारी है... कुछ गंभीरता में कटौती करने की .... कुछ अनजाने चेहरों पर अनचाही मुस्कान बिखेरने की... कुछ बेपरवाह ठहाकों की... कुछ दफा judgmental ना होने की... कुछ दूसरों के काम को appreciate करने की...कुछ खुद के काम से दूसरों को ख़ुशी देने की ...  अब आपकी बारी है कुछ उमीदों पर खरा ना उतरने की... कोशिश कीजिये... इतना मुश्किल भी नहीं है. 

Tuesday, 8 October 2013

मुझसे पहले मैं

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन.
सुबह का वक़्त था. मैं ट्रेन की अपनी बहोत ही " खुशनुमा " सफ़र खत्म कर के बाहर आ रहा था. "भईया, कहीं छोड़ दूं" एक बहोत ही बूढ़ा, शायद दो दिन से भूखा जो खुद खड़े होने तक की जद्दोजहद कर रहा था, वो मुझ जैसे भारीभरकम शरीर को ढोने की बात कर रहा था. "शुक्रिया दोस्त". बस यही निकला मेरे मुंह से और मैं आगे बढ़ गया.

शुक्रिया दोस्त..??... क्या चल रहा था मेरे दिमाग में. इसबार शायद कुछ भी नहीं. कम से कम उसकी लाचारी,बेबसी तो कत्तई नहीं. मेरे दिमाग में कोई चल रहा था तो वो मैं था. मैं, जो कुछ साल पहले इसी स्टेशन से उतरा था, इन्ही कमज़ोर , कर्कस और घुटन भरी आवाज़ों के बीच से गुज़रता हुआ. नफरत और घृणा से भरा, ऐसे अप्रिय शब्दों का प्रयोग करता हुआ जो मैं खुद अपने लिए नहीं सुनना चाहूँगा.


दिल्ली मेट्रो स्टेशन.
सुहानी शाम. दोस्तों के साथ. आज अपूर्व का जन्मदिन है. सभी उतने खुश हैं जितने exams के dates खिसकने पर भी नहीं होते. चीखते चिल्लाते हम बाहर निकलते हैं.. मेरी नज़र बाहर एक औरत, जो अपने दो साल के दिखने वाले बच्चे के साथ जो उसकी गोद में एक मांस के लोथड़े की तरह पड़ा हुआ था, पर गई. लेकिन इस बार मैं उसे अपनी जेब से पैसे निकल कर नहीं दे पाया.

क्या हो गया था मुझे...क्या चल रहा था दिमाग में. क्या अखबार का वो टुकड़ा जिसमे इस तरह के भीख मांगने वालों के गोरखधंधे के बारे में लिखा था.. या ये की आखिर ये कब तक मेरी ज़िम्मेदारी है.. इस बार आगे बढ़ते वक़्त मुझमे थोडा दुःख तो था लेकिन पश्चाताप की भावना नहीं. पिछली बार तो ऐसा नहीं था. पिछली बार तो ना वो अखबार का टुकड़ा था और न ही इतनी परिपक्वता.
 
... अजीब है ना. ये आप और हम ही हैं. एक ही समय में, एक ही परिस्थिति में, अलग अलग तरह से व्यवहार करते हुए. मैंने बस अभी इस बात का उदाहरण दिया है की हमारा दिल और दिमाग एक साथ काम करते भी हैं और नहीं भी.

जब हम छोटे होते हैं तो हमें बहोत चीज़ों का ज्ञान नहीं होता, हम अपने आस पास के environment से छोटी छोटी कड़ियाँ इकट्ठी करते हैं और उन्हें जोड़ने की कोशिश करते हैं. और जो हमारे सामने आता है उसे ही परम सत्य मान कर आगे की जिंदगी बिताने का खुद से वादा कर लेते हैं. हमें गांधी के आदर्श पसंद आते हैं, हमें खाने की बर्बादी पर गुस्सा आता है, हमें ऑटो से नहीं साइकिल से स्कूल जाना है, कपडे साफ़ और प्रेस चाहिए, रोड पर हुए गड्ढों के लिए हम भगवन को कोसते हैं, हमें हिरोशिमा पर हुए हमले दुनिया की सबसे बड़ी भूल लगती है. हम कोई सवाल नहीं करते. हम बस पुरानी चल रही भावनाओं और विचारों का आँख बंद कर पालन करते हैं.
 
हम थोड़े बड़े हुए. खुद पर थोडा शक हुआ. सवालों का भूख बढ़ा तो उन्हें पूरा करने की कोशिश में लग गए. इसका परिणाम ये हुआ की अब हम गांधीवादी नहीं रह गए, खाने की बर्बादी को ecological cycles में explain करने लगे, अब हमें साइकिल पर शर्म आती है, कपड़ों के साफ होने की ज़रुरत नहीं, रोड पर हुए गड्ढों के लिए अब हम भगवान् को नहीं नगर पालिका को कोसते हैं. अब हम हिरोशिमा पर हुए हमलों को आगे कभी ना होने वाली गलती की शिक्षा के रूप में लेते हैं. काफी कुछ बदल गया है.

हम थोड़े और बड़े होते हैं. इतने की शायद अब इससे बड़े होने की कोई गुंजाईश नहीं है. अब मैं परिपक्वता की पराकाष्ठा पर हूँ. अब सवालों की भूख नहीं है मुझे. अब जवाबों की कशमकश ही है. अब गाँधी समकालीन राजनीतिक परिस्थियों के लिए गलत और सामाजिक उत्थान के लिए अच्छे लगने लगे हैं, अब एक शादी में खाने की बर्बादी वहां काम कर रहे मजदूरों के भूखे सो जाने से ज्यादा बड़ी सजा नहीं लग रही, अब साइकिल चलाना ही स्वस्थ रहने का एक जरिया नजर आता है, कपडें साफ़ ना हों तो निकृष्टता की भावना घर करती है अब, रोड हुए गड्ढों के लिए अब नगरपालिका से ज्यादा भागवान पर गुस्सा आता है की कोई फ़िक्र भी है तुम्हे इस संसार की या नहीं, अब हिरोशिमा पर हुए हमले भले ही आगे के लिए एक शिक्षा हो लेकिन वहां खोई हुई इंसानों की जिन्दगिया अब ज्यादा अफ़सोस देती है.
 
जिंदगी वापस वहीँ आगे है जहाँ से शुरू हुई थी. वही जिंदगी जो कभी दिल से,कभी दिमाग से, कभी दोनों से तो कभी दोनों के बिना आगे बढती ही है. Chaos भले ही जिंदगी की सच्चाई भी हो और भ्रम भी, लेकिन ये आपके जिंदगी में किये गए फैसले ही हैं जो इसे रोके रखते हैं और आगे भी बढाते हैं. जिंदगी का सफ़र जहाँ शुरू होता है वहीँ खत्म भी.

Happy Cycle.

Wednesday, 2 October 2013

अरे... कौन है उधर !!!

O..NO.NO.NO….Nope… मैं कैसे !! मैं इतना छोटा हूँ अभी. इतना अपरिपक्व. मैं, मेरे विचार ना तो इतने विस्तृत हैं और ना ही अनुभवी की मैं इस बारे में कुछ लिख सकूँ.
ये ही जवाब था मेरा (और शायद आपका भी ) जब मुझसे किसी दोस्त ने कहा ... "भगवान् के बारे में लिखो."
मजाक है क्या उसके बारे में लिखना जिसे मैं मानता भी हूँ और नहीं भी. जनता भी हूँ और नहीं भी.

उसके बारे में लिखना जो वस्तु भी है और भावना भी. विश्वास भी है और अंध-विश्वास भी. जिसे आप मूर्ति माने ना माने आपकी श्रधा में कोई कमी नहीं आती. जिसे हम दुःख में भी उतना ही याद करते हैं जितना सुख में. क्या लिख सकता था मैं उसके बारे में.

मैंने उसे हमेशा एक 'सिक्के' की तरह माना है. जो खुद में दो पहलु लिए होता है. लाभ भी और हानि भी. सुख भी और  दुःख भी. खूबसूरती भी और बदसूरती भी. वो किसी एक पहलु का ना तो चयनकर्ता है और ना ही उत्तरदायी.

हमें कई बार भ्रम हो जाता है की हमारे साथ जो अच्छा हो रहा है वो ऊपर बैठा कोई इश्वर कर रहा है. वहीँ जैसे ही हमारे साथ कोई बुरा होता है हमारा विश्वास कम होने लगता है. मुझे नहीं लगता की उसपर आपके कम या ज्यादा विश्वास का कोई फर्क पड़ता होगा. अगर कोई है जिसपर फर्क पड़ता है, तो वो हम हैं.

जब हम कोई काम इस उम्मीद से करते हैं की कोई है जो हमारा साथ दे रहा है, कोई है जो हमारे साथ कोई बुरा नहीं होने देगा. उस वक़्त हम सिर्फ खुद को ही नहीं अपने आसपास के सभी जीवित और निर्जीव चीज़ों में एक पॉजिटिव एनर्जी दे रहे होते हैं. वो एनर्जी जो हमारी ही बने होती है हमारे ही लिए. इसका उल्टा अगर हम लेते हैं. हम अपने दिन की शुरुआत किसी नेगटिव विचार से करते हैं, तो हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने आसपास की सभी चीज़ों को हतोत्साहित कर रहे होते हैं. हमारा खुद पर से विश्वास कम हो जाता है. और ये तो इंसानी फितरत है, अगर खुद पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं तो किसी अनजान शक्ति पर कैसे कर लें.

अगर हम टेक्निकल भाषा में बात करें तो ये एकदम एक modulus ( |x| ) की तरह है, आप इसमें पॉजिटिव वैल्यू डालें या नेगेटिव रिजल्ट हमेशा एक पॉजिटिव वैल्यू होगी. हमें नहीं पता वो कौन है लेकिन ख़ुशी हो या गम हम उसे ही याद करते हैं. ये एक ऐसा पैरामीटर है जिससे हम नेगेटिव एनर्जी और positve एनर्जी ...दोनों को explain करते हैं. 
ये एक ऐसी एनर्जी है जिससे हम सभी जुड़े हुए हैं. अगर हम किसी को दुःख में देखते हैं, भले ही उसे हम जानते हों या ना हो, हमें दुःख होता है. हम उम्मीद करते हैं की काश उसके साथ ऐसा न हुआ होता. ये इस बात का एक बड़ा उदाहरण है की हमारे अन्दर कहीं न कहीं ये बात केन्द्रित होती हैं की हम एक दुसरे से जुड़े हैं और एक दुसरे की खुशियों या दुखों से प्रभावित होते हैं. ये प्रभाव ही वो शक्ति है जिसे हम शब्दों में भगवान् कह देते हैं.

अगर हम Christianity की बात करें तो उनमे उसे GOD नाम से जाना जाता है..जो असल में तीन शब्द Generator , Operator और Destroyer. हिन्दू धर्म में भी हम उसे ब्रह्मा , विष्णु और महेष नाम नाम से जानते हैं... जिनका काम Generation, Operation और Destruction था. इसके बारे में आपको बताने की ज़रुरत नहीं लगती मुझे. मेरा बस एक ही पॉइंट है. अगर पृथ्वी के दो अलग अलग छोर पर अगर एक जैसे विचार को अगर महज एक संयोग भी मान लें, तो भी इनपर विश्वास ना करने का ठोस कारण हम नहीं दे सकते.

बड़ी बड़ी चीज़ों में उसे खोजते खोजते छोटी छोटी चीजों पर से हमारा ध्यान भटक गया है. साइंस में हमने पढ़ा है की पानी भले ही बड़े से बर्तन में हो या एक छोटे से चम्मच में, ना तो उसकी अहमियत कम होती है और ना ही उसके लिए हमारी प्राथमिकता. वैसे ही हमें भी छोटी चीजों में उसे भूलना नहीं चाहिए. बड़ी खुशियों की और भागते हुए छोटी खुशियों को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए.

जैसा की मैंने पहले भी कहा है की मैं बहोत ही साधारण सा इंसान हूँ. मुझे तो वो बस एक छोटी सी हंसी में दिखता है. ठंढे से हवा के झोंको में. रंग बदलते पत्तों में. पके हुए फल में . काम से थक कर एक दोस्त से बात करने में. एक ' miss you, kamine' वाले मेसेज में, एक फोटो पर लड़ते हुए दोस्त में, रक्षाबंधन पर बहन की तरफ से आई राखी में, एक पुराने फोटो एल्बम के अचानक मिल जाने में, ट्रेन के सही समय पर पहुचाने में, मेट्रो में मशीन की तरह घुमते वक़्त किसी पुराने दोस्त के पीछे से कंधे पर हाथ रखने में, किसी को शुक्रिया कहने पर 'मर क्यूँ नहीं जाता' सुनने में, किसी सुबह आंख खुलने पर खुद को घर पर पाने में, सुबह सुबह unhygienic सी ब्रेड रोल खाने में, बारिश में नहाने में, पहले बर्थडे बम्प्स में, तुम्हारी पहली कमाई में, यहाँ तक की एक 3G कनेक्शन में भी .... मुझे उसे मानने या ना मानने की ज़रुरत नहीं. अगर वो है तो उसे इन सब के लिए बहोत बहोत धन्यवाद. और अगर वो नहीं है तो इनसब लम्हों को मेरी जिंदगी में आने और लाने के लिए आप सभी को धन्यवाद. 

Friday, 9 August 2013

शायद कल

जब दिल्ली में कांड हुआ तब मैं वहां पर ही था. आप भी सोच में पड़ गए होंगे की भला किस कांड की बात कर गया मैं.एक तो हुआ नहीं है वहां. रोज नए मसाले के साथ वहां की मीडिया हमारे सामने हाज़िर रहती है. इतना मत सोचिए जनाब .. आप किसी भी केस की पहले, साथ और बाद के हालात को ले सकते हैं.

हम इंजीनियरिंग स्टुडेंट्स को अक्सर मेस में सड़ा खाना ही नसीब होता है. और खास कर दिल्ली जैसे शहर में तो रोज बाहर खाना हम जैसे afford  भी नहीं कर पाते. ऐसा नहीं है की हमारे घर वाले पैसे नहीं देते हमें. वो तो बस ऐयाशियों में उड़ जाते हैं. सो हम अक्सर रात को खाने के बाद दिल्ली मेट्रो में कुछ ठंढी हवा खाने और आँखों को सुकून दिलाने निकल पड़ते. भईया दिल्ली है ये... यहाँ रात आठ बजे भी रौनक अपने सातवें आसमान पर होती है.

रात में अपने assignment  के बोझ तले दबा ये इंजिनियर जब सुबह कुछ देर से उठा तो पूरे हॉस्टल का माहौल कुछ बदला सा था. ऐसा लग रहा था की किसी exam  का रिजल्ट अचानक से आ गया हो. उन कुछ मिनटों में मेरे ऊपर क्या गुज़री होगी ये शायद आपको बताने की ज़रूरत नहीं है.

मैं बहोत कुछ समझ पाता तबतक एक बंदा एक न्यूज़ पेपर का front पेज लेकर मेरे पास आया. मैं पढ़ पाता तबतक उसने सारी कहानी एक सांस में सुना दी. उस लड़की के बारे में, जो 10  दिन तक मीडिया की TRP बढा कर इस दुनिया से जाने वाली थी. और उन इंसानों के बारे में भी जो जाने किस नस्ल के थे. शायद इंसान भी ना हों. क्या पता.

करीब आधा घंटा इसपर देने के बाद मैं कॉलेज के लिए निकला. वहां भी यही हाल. लंच पर भी. सब की जबान पर एक ही बात थी. आज लोगों में गम था गुस्सा था. सभी इंडिया गेट जाना चाहते थे. सभी अपना आक्रोश ज़ाहिर करना चाहते थे. लेकिन आज लोग भटके हुए थे. डरे हुए. उन्हें ये समझ नहीं आरहा था की गुस्सा किसपर उतारें. हमारी व्यवस्था पर , हमारे समाज पर या हमारे लड़के लड़कियों पर. और सबने गुस्सा उतरा. किसी एक पर नहीं.  सभी पर उतरा.

लेकिन
सवाल अभी भी वही था... सामाजिक उत्पीडन तो हुआ था. लड़कियों का और लड़कों का. वो भले ही शारीरिक हो या मानसिक. लड़कियाँ अब रात में अपने घरों से निकलने से डरने लगीं थी. वो अपने साथ के पुरुषों से घबराने लगी थीं. लड़के अब किसी लड़की को देखने से पहले सोचते थे. किसी हमशक्ल के धोखे में अब कोई लड़का किसी लड़की को नाम से नहीं पुकारता था. बाप अपनी बेटी को दिल्ली से बाहर पढाना चाहते थे. जिनकी बेटियां पहले से दिल्ली में थीं उनके डॉक्टरों की कमाई उनके blood pressure की तरह बढ़ने लगे थे. लड़के किसी अनजान लड़की की मदद करने से घबराने लगे थे. उन चौपालों पर अब लड़कियों की बातें नहीं हुआ करती. अब कोई 'देख भाभी आज पीले सूट में आई हैं' नहीं कहता था. तेरी-वाली मेरी-वाली पर शर्तें नहीं लगती अब.  Ladies  कम्पार्टमेंट में कोई मजनू किसी का पीछा करते नहीं घुसता था. अब हमने भी खाने के बाद ठंढी हवा खाने और आँखों को सुकून दिलाने की अपनी आदत को खत्म कर दिया था. दिल्ली में रौनक तो थी लेकिन डरी, सहमी और असहाय.

व्यंग लिखने की सोचा था ..लेकिन लिखा नहीं गया ..शायद ठंढी हवा खाने की आदत अभी पूरी तरह गई नहीं. शायद ये निगाहें अभी भी रात के आठ बजे दिल्ली के मेट्रो में बेबाक, बेख़ौफ़ और बिंदास रौनकों के उम्मीद में हैं. शायद अभी हमने उमीदें रखनी खत्म नहीं की है. शायद ...