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Thursday, 14 November 2013

नयी फटी शर्ट

रोज़ की तरह आज भी सुबह 6 बजे अलार्म की आवाज़ ने मुर्गे का काम आसान करते हुए मुझे हौले से जगाया. हाँ सच में. और कसम से गुस्सा तो मुझे आया ही नहीं. आता भी क्यूँ रोज़ का काम है उस बेचारे का. मैं बस उठा और "बहोत ही अच्छे मन से" बाथरूम की ओर तेज़ी से बढ़ा. मुझे अगर कोई सुबह सुबह बाथरूम की ओर भागता देख लेता तो उसे कारगिल पर सीमा की ओर भागते सैनिक की याद ज़रूर आ जाती.

लेकिन आज कुछ अलग हुआ. मैं बाथरूम तक नहीं पंहुच पाया. मेरे कदम बाहर से आ रही एक छोटी सी किरण ने रोक दी. एक छोटी सी रौशनी जो खिड़की के कोने से सीधे मेरे table पर आरही थी. मैंने अपने अन्दर के भाई-देर-हो-रही-है वाले इंसान को थोडा आराम दिया और खिड़की की ओर बढ़ा. खिड़की खुलते ही एक ठंढा सा हवा का झोंका मेरे चेहरे पर  पड़ा. ना बहोत खुश्क और ना ही नम, एकदम नपा तुला, सौंधी महक लिए वो ठंढा झोंका जो सूरज की चमक और गर्मी में मिलकर एक अलग सा एह्साह दे रहा था, सीधे मेरे चेहरे पर पड़ रहा था. मैंने आँखें बंद की और उस नए से एहसास  से खुद को वाकिफ कराने लगा.

लेकिन एक मिनट ....ये एहसास, ये सुकून, ये हवा कुछ जानी पहचानी सी लगी... कुछ अपनापन लिए.. किसी पुराने दोस्त की तरह. एक ऐसा एहसास जिसकी आगोश में आकर कोई परेशानी, कोई मुश्किल बस एक अफवाह से ज्यादा होने की जुर्रत नहीं करते. मेरे कानों में एक आवाज़ पड़ी - 'भाई !!! जल्दी उठ, सन्डे हैं, सात बज गए हैं, "रंगोली" के गाने छोड़ने का सोचा है क्या.' मेरी आँख एक ही आवाज़ में खुली और दो मिनट से कम वक़्त में मैं टीवी के सामने आँख फाड़े बैठा था. और पांच मिनट में मेरे सामने मेरे-सन्डे स्पेशल ब्रेड रोल और चाय थे. और पीछे से चिल्लाती माँ की आवाज़ " ठंड शुरू हो गई है कम्बल में घुसो ". उस कम्बल की गर्मी में calories और cholesterol वाले ब्रेड रोल का लुत्फ़, किशोर और मुकेश के पुराने गाने सुनते हुए लेने के बाद बारी थी सारे गमलों को पानी देने की. विश्वास करिए उन गमलों में रोबिन-हुड से लेकर गुलिवर तक की कहानियों के सेट बन चुके होते थे. ये कहानियां तब तक चलती रहतीं जबतक रोबिन-हुड और गुलिवर के बीच झगडे न शुरू हो जाते और माँ उनकी जगह हमारे पीछे झाड़ू लेकर भागती नज़र ना आने लगतीं. वैसे ये हाल कैरेम और लूडो के घंटों चलते matches के बाद भी देखने को मिल जाते थे जब नियम बनाते भी हम ही थे और तोड़ते भी. मोहल्ले में हो रहे क्रिकेट टूर्नामेंट में आप तभी जा सकते थे जब माँ किसी काम में इतनी व्यस्त हों की आप के घर पर ना होने से पैदा हुई शांति उनके परेशान होने का कारण ना बन जाए. ये एक आत्मघाती विस्फोट की तरह होता था जिसका detonation आपके लौटने के बाद आपके कारनामे और फटी हुई शर्ट खुद करती थी. उफ्.. तब तो गला फाड़ फाड़ कर रोने में भी शर्म नहीं आती थी.


मैंने ऑंखें खोली. अब मेरे अन्दर कहीं जाने की जल्दी नहीं थी. कोई झुझलाहट नहीं थी. मैंने ऑफिस फ़ोन लगाया और अपने बहोत-बहोत बीमार होने की बात बताई. लेकिन मैं बीमार नहीं हूँ. कुछ वक़्त चाहता हूँ. अपने लिए , बहोत सालों बाद. मैं इस सुबह की किरण को इस हवा को समेटना चाहता हूँ जो शायद हमेशा से मेरे आसपास ही थीं. लेकिन उन्हें देखने की मैंने न कभी कोशिश की और न ही ज़रुरत समझी. मुझे कुछ पकोड़े बनाने हैं अपने लिए जिसे चाय की हर एक चुस्की के साथ एन्जॉय करना है. मुझे कुछ कॉल करने हैं, अपने पुराने दोस्तों को जिन्हें मैं इस बड़े शेहेर की भागदौड़ में उस अमरुद के पेड़ पर छोड़ आया हूँ. कुछ चिट्ठियां लिखनी हैं उन खडूस अंकलों को जिनकी खिड़कियाँ आज भी हमारी गेंदों की निशान संजोये हुए हैं. कुछ किशोर की चुलबुली आवाज़ सुननी है, कुछ मुकेश के उफ़... वो दर्द भरे नगमे गुनगुनाने हैं. कुछ पुराणी पिक्चर देखनी हैं. एक दिन इस newspaper का मजाक बनाना है, बिना खोले बड़ा सा प्लेन बनाना है. आज थोडा कमज़ोर होना है, उस आम के पेड़ से गिरना है. आज बेवजह रोना है, कुछ आंसू बहाने हैं. फिर बिना किसी टेंशन के छत पर टेहेलना है और फिर आसमान को बेवजह घूरते हुए सो जाना है.


बहोत कुछ करना है आज. वो सब जो शायद मैं करना भूल गया हूँ, जो हम करना भूल गए हैं. कुछ ब्रेक अपने सपनों के पीछे भागने से लेते हैं और एक दिन अपने अन्दर के बचपन को देते हैं.


Happy Children-in-everyone every-day

Monday, 28 October 2013

Boiled egg या Fried egg ??

आपको लग सकता है की ये क्या है. सवाल तो कभी ये था ही नहीं. सवाल तो हमारे बुजुर्ग हमेशा से ये पूछते आये हैं की पहले मुर्गी आयी या अंडा. आपको लग सकता है की मैं पागल तो नहीं हो गया !! शायद हाँ , शायद ना.
बात ऐसा है की मुझे बुजुर्गों वाले सवाल के जवाब से ज्यादा ख़ुशी मेरे इस सवाल के जवाब से मिलती है. और आप ऐसा मत सोचिये की ये सवाल मुझसे किसी नेशनल इंस्टिट्यूट के सेमीनार में पुछा गया था और उसके जवाब से मुझे नोबेल पुरस्कार मिलने वाला है, जो मैं इतना खुश हो रहा हूँ. ये सवाल तो मुझसे " तूफानी अंडा शॉप " के पप्पू भईया ने पुछा था. और मैंने बस प्यार से उन्हें कहा था " आज Boiled में ही समेट दे भाई !! " .


आप बिलकुल सही हैं. ना तो मैंने कुछ ऐतिहासिक काम किया है और ना ही कुछ ऐसा जिससे मुझे इतनी ख़ुशी होनी चाहिए. लेकिन फिर भी मैं खुश हूँ. खुश इसलिए भी क्यूंकि इस वक़्त मुर्गी और अंडे के बीच सदियों से चल आरही लड़ाई में जीत किसी की भी हो हमारे 'आज' पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा. मैं एक ऐसी ख़ुशी के लिए जिसके होने ना होने की कोई गारेंटी भी नहीं के लिए अपनी छोटी सी ख़ुशी कुर्बान नहीं करना चाहता.


हम आज यही कर रहें हैं ..बड़ी खुशियाँ , बड़ी महत्वकांक्षा के पीछे भागते हुए छोटी खुशिया, छोटी ज़रूरतों पर हमारा ध्यान नहीं जाता. आपके लिए ये समझना बहोत ही ज़रूरी है की छोटे पड़ाव उतने ही ज़रूरी हैं जिनती एक बड़ी मंजिल.

ये छोटी छोटी खुशियों के पल हमारे लिए एक Atom के ऊपर एक छोटे से Photon energy pouch की तरह काम करती हैं. ऐसा एक छोटा सा pouch जो आपको stabilize भी कर सकते हैं और destabilize भी. और अजीब बात ये है की इस stable state में पहोचने के लिए आपको किसी बड़े एनर्जी पैकेट को पाकर ऊँचे लेवल पर जाने की भी ज़रुरत नहीं है. और अगर आप किसी ऊपर के लेवल पर पहोच भी जाते हैं तो भी आपको उन खुशियों को बांधे रखने के लिए इन छोटी छोटी खुशियों के photons को संजोये रखना होगा.

आज बड़े शहरों में बड़ी कंपनियों , MNCs के बुद्धिजीवी हमारे इन महत्वकान्छओं को काफी अच्छी तरह आँका है और इसका इस्तेमाल अपने फायदों के लिए हमारे ही खिलाफ किआ है. थोडा सा बोनस , थोड़े से तोहफे, थोड़े से वादों देकर वो हमसे ये छोटी छोटी खुशियों की झोली मांग लेते हैं और हम भी इसे बड़ी आसानी से दे देते हैं. इस छोटी झोली की बड़ी कीमत का अंदाज़ा हमें आगे चल कर होता है जब हम भीड़ में इतने आगे निकल जाते हैं की वापस आना मुश्किल हो जाता है.

बड़ी खुशियों के पीछे जाना बुरा नहीं है, बल्कि समाज के evolution के लिए ज़रूरी भी है. लेकिन इन छोटी खुशियों की कुर्बानी देकर नहीं. हम कहीं बड़े सवालों के जवाब की खोज में कहीं इतने व्यस्त ना हो जाएँ की छोटे सवाल आपसे मुंह ही मोड़ लें.

अब ये हमारे ऊपर है इस मुर्गी-अंडे के जवाब के वादे में क्या हम सामने रखे boiled egg और fried egg के option को ही खत्म कर देते हैं या मुर्गी को थोडा इंतज़ार करने को कह कर छोटी खुशियों को हज़म की शाजिश में लग जाते हैं. सवाल और जवाब हमेशा से आपके सामने ही था और आगे भी रहेगा , मुद्दा ये है की आप चुनते किसे हैं.

मैं भी किन चक्करों में पड़ गया... पप्पू यार !!! Boiled लगाया नहीं अभी तक....


Ps. Happy vacations ( if u have any )

Tuesday, 8 October 2013

मुझसे पहले मैं

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन.
सुबह का वक़्त था. मैं ट्रेन की अपनी बहोत ही " खुशनुमा " सफ़र खत्म कर के बाहर आ रहा था. "भईया, कहीं छोड़ दूं" एक बहोत ही बूढ़ा, शायद दो दिन से भूखा जो खुद खड़े होने तक की जद्दोजहद कर रहा था, वो मुझ जैसे भारीभरकम शरीर को ढोने की बात कर रहा था. "शुक्रिया दोस्त". बस यही निकला मेरे मुंह से और मैं आगे बढ़ गया.

शुक्रिया दोस्त..??... क्या चल रहा था मेरे दिमाग में. इसबार शायद कुछ भी नहीं. कम से कम उसकी लाचारी,बेबसी तो कत्तई नहीं. मेरे दिमाग में कोई चल रहा था तो वो मैं था. मैं, जो कुछ साल पहले इसी स्टेशन से उतरा था, इन्ही कमज़ोर , कर्कस और घुटन भरी आवाज़ों के बीच से गुज़रता हुआ. नफरत और घृणा से भरा, ऐसे अप्रिय शब्दों का प्रयोग करता हुआ जो मैं खुद अपने लिए नहीं सुनना चाहूँगा.


दिल्ली मेट्रो स्टेशन.
सुहानी शाम. दोस्तों के साथ. आज अपूर्व का जन्मदिन है. सभी उतने खुश हैं जितने exams के dates खिसकने पर भी नहीं होते. चीखते चिल्लाते हम बाहर निकलते हैं.. मेरी नज़र बाहर एक औरत, जो अपने दो साल के दिखने वाले बच्चे के साथ जो उसकी गोद में एक मांस के लोथड़े की तरह पड़ा हुआ था, पर गई. लेकिन इस बार मैं उसे अपनी जेब से पैसे निकल कर नहीं दे पाया.

क्या हो गया था मुझे...क्या चल रहा था दिमाग में. क्या अखबार का वो टुकड़ा जिसमे इस तरह के भीख मांगने वालों के गोरखधंधे के बारे में लिखा था.. या ये की आखिर ये कब तक मेरी ज़िम्मेदारी है.. इस बार आगे बढ़ते वक़्त मुझमे थोडा दुःख तो था लेकिन पश्चाताप की भावना नहीं. पिछली बार तो ऐसा नहीं था. पिछली बार तो ना वो अखबार का टुकड़ा था और न ही इतनी परिपक्वता.
 
... अजीब है ना. ये आप और हम ही हैं. एक ही समय में, एक ही परिस्थिति में, अलग अलग तरह से व्यवहार करते हुए. मैंने बस अभी इस बात का उदाहरण दिया है की हमारा दिल और दिमाग एक साथ काम करते भी हैं और नहीं भी.

जब हम छोटे होते हैं तो हमें बहोत चीज़ों का ज्ञान नहीं होता, हम अपने आस पास के environment से छोटी छोटी कड़ियाँ इकट्ठी करते हैं और उन्हें जोड़ने की कोशिश करते हैं. और जो हमारे सामने आता है उसे ही परम सत्य मान कर आगे की जिंदगी बिताने का खुद से वादा कर लेते हैं. हमें गांधी के आदर्श पसंद आते हैं, हमें खाने की बर्बादी पर गुस्सा आता है, हमें ऑटो से नहीं साइकिल से स्कूल जाना है, कपडे साफ़ और प्रेस चाहिए, रोड पर हुए गड्ढों के लिए हम भगवन को कोसते हैं, हमें हिरोशिमा पर हुए हमले दुनिया की सबसे बड़ी भूल लगती है. हम कोई सवाल नहीं करते. हम बस पुरानी चल रही भावनाओं और विचारों का आँख बंद कर पालन करते हैं.
 
हम थोड़े बड़े हुए. खुद पर थोडा शक हुआ. सवालों का भूख बढ़ा तो उन्हें पूरा करने की कोशिश में लग गए. इसका परिणाम ये हुआ की अब हम गांधीवादी नहीं रह गए, खाने की बर्बादी को ecological cycles में explain करने लगे, अब हमें साइकिल पर शर्म आती है, कपड़ों के साफ होने की ज़रुरत नहीं, रोड पर हुए गड्ढों के लिए अब हम भगवान् को नहीं नगर पालिका को कोसते हैं. अब हम हिरोशिमा पर हुए हमलों को आगे कभी ना होने वाली गलती की शिक्षा के रूप में लेते हैं. काफी कुछ बदल गया है.

हम थोड़े और बड़े होते हैं. इतने की शायद अब इससे बड़े होने की कोई गुंजाईश नहीं है. अब मैं परिपक्वता की पराकाष्ठा पर हूँ. अब सवालों की भूख नहीं है मुझे. अब जवाबों की कशमकश ही है. अब गाँधी समकालीन राजनीतिक परिस्थियों के लिए गलत और सामाजिक उत्थान के लिए अच्छे लगने लगे हैं, अब एक शादी में खाने की बर्बादी वहां काम कर रहे मजदूरों के भूखे सो जाने से ज्यादा बड़ी सजा नहीं लग रही, अब साइकिल चलाना ही स्वस्थ रहने का एक जरिया नजर आता है, कपडें साफ़ ना हों तो निकृष्टता की भावना घर करती है अब, रोड हुए गड्ढों के लिए अब नगरपालिका से ज्यादा भागवान पर गुस्सा आता है की कोई फ़िक्र भी है तुम्हे इस संसार की या नहीं, अब हिरोशिमा पर हुए हमले भले ही आगे के लिए एक शिक्षा हो लेकिन वहां खोई हुई इंसानों की जिन्दगिया अब ज्यादा अफ़सोस देती है.
 
जिंदगी वापस वहीँ आगे है जहाँ से शुरू हुई थी. वही जिंदगी जो कभी दिल से,कभी दिमाग से, कभी दोनों से तो कभी दोनों के बिना आगे बढती ही है. Chaos भले ही जिंदगी की सच्चाई भी हो और भ्रम भी, लेकिन ये आपके जिंदगी में किये गए फैसले ही हैं जो इसे रोके रखते हैं और आगे भी बढाते हैं. जिंदगी का सफ़र जहाँ शुरू होता है वहीँ खत्म भी.

Happy Cycle.

Thursday, 31 January 2013

Back in Eighth

8 वीं में था मैं. छोटे से शहर का छोटा सा स्कूल. मुझे इससे फर्क नहीं पड़ता है. पड़ता भी क्यूँ अबतक मैं १० स्कूल बदल चूका था.  जी नहीं .. मैं मंद बुद्धि का नहीं था बस मेरे पिताजी एक सरकारी मुलाजिम थे जिनकी नौकरी उन्हें एक जगह ज्यादा दिन नहीं टिकने देती थी. वैसे अगर एक दो स्कूल और बदल लेता तो आपका पहला अनुमान शायद सही होता.

हाँ तो मैं इस स्कूल के बारे में बता रहा था. छोटा सा क़स्बा था तो लोग भी सीधे साधे ही थे. और वैसे भी 8 वीं के बन्दे को क्या फर्क पड़ता है कसबे क लोगों से. मेरी सुबह भी आम बच्चों की तरह सुबह ज़बरदस्ती जागने से होती थी. मुझे भी स्कूल जाना वैसा ही लगता था जैसा आपसभी को लगता था. मैं ये मान रहा हूँ की अगर आप ये पढ़ पा रहे हैं तो कभी जाने अनजाने स्कूल की शक्ल तो देखी ही होगी .खैर. एक बार जागने के बाद चीजें मेरे हाथों से ज्यादा निकलती नहीं थीं. इस बात का गवाह मेरे यहाँ लगा वो छोटा सा गेंदे का पौधा है जिसने complan वाला दूध पीते हुए अपनी जवानी क दिन बिताएं हैं.

पॉकेट मनी के नाम पर 2 दिन में 3 रूपए मिला करते थे. उन 3 रुपएओं को रुमाल में फोल्ड कर के जेब में दुबका कर मैं अपनी black inferno पर सवार होकर तेजी से पैडल मारता हुआ निकलता था. जी हाँ .. आपको शायद एक बार black inferno , Lamborghini Gallardo जैसी फील दे रहा होगा.लेकिन मुझे ऐसा रोज ही महसूस होता था. वक़्त ही ऐसा था. मैं तेजी से निकल तो जाता था लेकिन घर लौट कर रोज गेट खुला छोड़ जाने के लिए डांट खाता था. अब आप ही बताइए , सुबह सुबह उस बड़े से टीन के डब्बे को हाथ कौन लगाए जब साइकिल का टायर ये काम अच्छे से कर ही देता ही देता था.हाँ अधूरा काम ही सही.

जैसे तैसे चौराहे तक साइकिल चेतक की तरह भागते हुए पहुचता था। और चौराहे आते ही साइकिल अपने आप रुक जाया करती थी। शायद अपने आप या शायद.. पता नहीं..बस रुक जाती थी। और आँखे दूसरी तरफ से आते अपने दोस्तों की टोली को ढूँढने लगती। उस वक़्त हाथों पर लगी घडी से ज्यादा आगे निकलते दुसरे साइकल्स के झुण्ड पर ज्यादा भरोसा हुआ करता था। गालियों का दौर तो बड़ा आम था।अगर मैं देर से चौराहे पर पहुचता था तो मैं गाली खाता था और अगर वो देर से पहुचते तो प्रसाद बाँटने का काम मैं करता। नियम बहोत ही आसान थे।

ये चौराहा ही वो जगह थी जहाँ हम newton साहेब को अलविदा कह कर einsten महोदय को अपने आगे की बागडोर थमा देते थे। अगर चौराहे से स्कूल के बीच मेरे परिवार से किसी ने मुझे कभी देख लिया होता तो मैं आज यहाँ ये ब्लॉग नहीं लिखने की जगह बगल वाले ब्लाक में घास काट रहा होता। हमारे रास्ते में एक नदी पड़ती थी। आज तक ऐसा नहीं हुआ जब हम वहां न रुके हों।क्यूँ। आज तक हम भी इस सवाल का जवाब ढूंढ नहीं पाए।

रोज का यही नाटक था हमारा। जैसे तैसे हम सही सलामत स्कूल पहुच ही जाते थे।और स्कूल गेट से अन्दर घुसने के साथ ही हमारी दूसरी युध्भूमि तैयार रहती थी। साइकिल स्टैंड। विश्वास कीजिए , ये काम जितना आसान सुनने में लगता है वैसा बिलकुल भी नहीं हुआ करता था। जो आगे साइकिल लगाएगा वो ही शाम को सबसे पहले घर की और निकलेगा। वैसे ये काम मेरे लिए आसान हुआ करता था। अरे धोखा मत खाइये .. मैं रोज आगे नहीं लगाता था .. मैं कम लम्बाई वाले लडको में हुआ करता था ..इसलिए मैं चुपचाप पीछे लेजाकर साइकिल लगा दिया करता था।

अब वक़्त था तीसरे महायुद्ध का। ये सबसे आम लड़ाई हुआ करती थी। सीट्स। अब ये मत कहिएगा की आपने इस युद्ध को कभी महसूस नहीं किया है। आगे की दो लाइने तो वो बच्चे ले लिया करते थे जो शायद घर जाते ही नहीं थे। पता नहीं, लेकिन हमारी जंग तो तीसरे और उसके पीछे वाले बेंचों क लिए हुआ करती थी। ये वक़्त हुआ करता था जब हम उस किताबों से भरे अपने बस्तों को पोटली और सीट्स को DTC बस बना लेते थे। जिसकी पोटली पहले गडी, सीट उसकी हुई। पिछली बेंच पर बैठने पर एक बात तो तय हुआ करती थी आपका लंच , लंच ब्रेक से पहले खत्म हो जाएगा। "सर, मुझे पीछे से दिखाई नहीं देता है!" और लीजिए अपनी लम्बाई का  वो फायदा जो मैं द्वितीय ( विश्व ) युद्ध में नहीं उठा पता था वो यहाँ तृतीय ( विश्व ) युद्ध में उठा लेता था। जी हाँ, मैं शुरू से चालू आइटम हुआ करता था।

अबतक जो भी हुआ था वो हम बेचारे और मासूम बच्चों ( खी खी खी ) के बीच हुआ करता था। लेकिन अब उस विलेन की एंट्री की बारी थी जिसे हम कहते थे ' The PT Teacher '। हे हे .. मजाक कर रहा हूँ।उस वक़्त PT टीचर के नाम के आगे  THE लगाने का रिवाज नहीं हुआ करता था। हम उसे रज्जो बुलाते थे. और हमारे पास उसके रज्जो होने का पूरा कारण भी हुआ करता था. हमने आज तक किसी रजाई वाले को इस तरह रजाई धुनते नहीं देखा था जिस तरह वो लड़कों को धुनता था.सिर्फ मोज़े सही से ना पहनने पर तो बादशाह सलामत हिटलर भी इतने खफा नहीं होते थे जितने ये हमारी रज्जो रानी हो जाया करती थी. ( परेशान मत होइए रज्जो जी पुरुष ही थे ).आज के वक़्त में अगर कोई टीचर किसी को 4 डंडे मार दे तो सुप्रीम कोर्ट में फाइलों की संख्या बढ़ जाती है. उस वक़्त ऐसा नहीं था.

उस लाइन में सबसे आगे कोई नहीं लगना चाहता था. रज्जो जो घूमता था.हम पीछे ही रहते थे. स्टेज पर किसी से हुई एक गलती कब बेफिजूल की हंसी में बदल जाती थी, किसी को खबर नहीं होती. हम छुपे रुस्तमों में से थे. मजाक मैं 8 th की लाइन में करता जो 9th की लाइन से होते हुए किसी 10th वाले के गले की घंटी बन जाती.उस दिन रज्जो के हाथो एक नया एंटरटेनमेंट देखने को मिलता.जब ये सब निपट जाता तो हम बड़ी शांति से अच्छे बच्चों की तरह अपने अपने क्लासेस की और निकल पड़ते.बिना एक आवाज किए हुए.

आज सोचता हूँ की क्यूँ गेट को बिना किसी फ़िक्र के आधा खोल कर घर से निकल पाता हूँ. क्यूँ जिंदगी उस बेफिक्र साइकिल की तरह नहीं चल पाती. क्यूँ हम आज इतना बेफिक्र बेवजह बिना कारण किसी नदी पर रुका पाते . क्यूँ किसी का नाम बिगाड़ते वक़्त इतना सोचना पड़ता है. क्यूँ मैं एक दिन बिना घडी क नहीं काट सकता हूँ. क्यूँ आज मैं किसी चौराहे पर किसी अपने का इन्तेजार नहीं करता हूँ. क्यूँ दिन की ऐसी शुरुआत अब नहीं होती. क्यूँ.

Wednesday, 30 January 2013

Chat box

21 वीं  सदी है ये या शायद 22 वीं।क्या फर्क पड़ता है। इसे हम आज का जमाना कहते हैं। और हम हैं आज के इंसान। हाँ भाई, हों भी क्यूँ ना, कल का इंसान तो कहीं ऑफिस में या तो किसी पर चिल्ला रहा होगा या किसी की सुन रहा होगा। लेकिन हमें इस बात से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हम शान्ति प्रिय इंसान हैं। शाम को जब वो थका मांदा इंसान घर लौटेगा तब ही निपटेंगे उससे। आपने भी ना, पता नहीं किस बेतुकी बात में ऊलझा दिया मुझे। मैं बात कर रहा हूँ - इस जमाने की। ना ना ना ..धोखा मत खाइये , जब मैंने कहा इस ज़माने की तो मेरा मतलब था सिर्फ इस जमाने की। मुझे न तो अपने भूत से कोई शिकायत है और ना की अपने भविष्य की चिंता। तो हम सिर्फ हमारी बात करेंगे।

मैं मल्होत्रा जी के यहाँ आज 21 साल के एक मित्र से मिला। मल्होत्रा जी हमारे पडोसी हैं।  असल में "मल्होत्रा" सबसे ज्यादा बिकने वाला हेल्दी सा सरनेम है , इसलिए इस्तेमाल कर रहा हूँ। चलिए टॉपिक से भटकते नहीं हैं। तो मैं इस शख्स से मिला। ज्यादा खुश नहीं लग रहा था। मैं उससे कारण पूछ ही लेता अगर उसकी शक्ल उन ढाई घंटो में लैपटॉप से हटकर एक बार भी इधर उधर गई होती। मैं शिकारी की तरह महसूस कर रहा था जो शिकार की ताक में घात लगे बैठा था। मेरे दिमाग में चल रहा था की हो सकता है इसे भी राजनीतिक उथलपुथल की भनक लग गई होगी और ये अपने विचारो के गहमा गहमी में अपने सामने पिछले ढाई घंटे से बैठे भीमकाए शरीर को ना देख पा रहा हो ( जनाब ये मैं अपने आपको संबोधित कर रहा हूँ, इतनी तो आजादी है ना ) फिर दूसरा विचार आया की नहीं यार हो सकता है की अंतररास्ट्रीय ख़बरों का शौक़ीन हो .. अब दुनिया इतनी बड़ी है , उसके बारे में जानने में इतना वक़्त देना तो बनता है। लेकिन अभी भी उसका सडा सा चेहरा मेरे लिए किसी रहस्य से कम नहीं था। तभी उसके लैपटॉप से एक बीप की आवाज आई और ये मेरे नए मित्र कुछ बडबडाते हुए चार्जर की ऒर बढ़ी। मैंने सोचा अच्छा मौका है। मैंने झट से पहला सवाल दागा " परेशान हो??"

कुछ वक़्त की मिन्नतों के बाद जो बात पता चली उसने मेरे सोचने के नजरिए को थोडा बदल दिया। ऐसा नहीं है की मुझे परम सत्य की प्राप्ति हुई, बस कुछ बदल गया! और आप , आप तो जब सुनेंगे तो सोचेंगे की ये इंसान पागल हो गया है, इस आम सी बात का ये बतंगड़ बना रहा है।

ब्रेकअप!!! हाँ .. ये जनाब जो की मल्होत्रा जी के सबसे बड़े सुपुत्र हैं, वे पिछले ढाई घंटे से किसी अंतररास्ट्रीय खबर या राजनितिक मुद्दे को लेकर नहीं, अपनी जिंदगी में चल रहे भावनात्मक पहलू को लेकर परेशान हैं। अरे आपको तो हंसी आ रही है। मुझे पता है की आप मेरी मुर्खता पर हंस रहे हैं की मैं इस छोटी सी बात को इतने जोर देकर क्यों पेश कर रहा हूँ।

बात सिर्फ भावनात्मक पहलु की नहीं है बात है नैतिक मूल्यों और अपनी जिम्मेदारियों की। आज का युवा ठंड में रजाई में दुबक कर बहोत ही आसानी से चाय की चुस्कियां लेते हुए फेसबुक और ट्विटर जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर सारे ज्वलनशील मुद्दों पर अपनी राय दे रहा है। एक तरह से देखा जाए तो ये अच्छी बात है। कम से कम उसे देश और विदेश की कुछ खबर तो है। मेरा सवाल सिर्फ इतना है क्या यह राय आपके खुद की बनाई हुई है ?? कहीं आप भेड़चाल का हिस्सा तो नहीं। क्यूंकि अपनी राय बनाने की लिए हमें थोडा वक़्त तो उस मुद्दे की सभी पहलु को देखने में देना ही होगा। और इतना वक़्त तो है ही नहीं हमारे पास। जो भी वक़्त पढाई ( मैं इसे भी काम मान ही लेता हूँ )  और दोस्तों से मिलने मिलाने के बाद मिलता है वो फेसबुक पर इन्वेस्ट ( इन्वेस्ट की जगह बर्बाद लिखना मुझे भारी पड़ सकता था ) हो जाता है।

मैंने अपने हॉस्टल के एक मित्र से पुछा तो उसने कहा - मालिक दो मिनट की मैगी बनाने की तो फुर्सत नहीं है दुनिया भर के चोचलों पर राय कहाँ से बनाता फिरूं। मैंने सोचा कह भी तो सही रहा है, अपने 723 दोस्त, जो फेसबुक पर हैं उनकी समस्याएँ क्या कम हैं सुलझाने को जो साउथ अफ्रीका के किसी दुरस्त गाँव में भूख से मर रहे लोगों क बारे में चिंता करूँ। वो कौन सा मेरे ताऊ के लड़के हैं। और जितना मेरे आतंरिक शांति की बात है, वो मैंने एक पेज को लिखे कर के पा ली है। नहीं नहीं ..सच में . उसपर एक अजीब से गंदे बच्चे की तस्वीर थी ( मुझे तो लग रहा है की photoshop की हुई थी ) और लिखा भी था की मैं जितना लाइक करूँगा उतने पैसे उस बच्चे को दिए जाएँगे .. और मैंने फटाफट लाइक्स भी ठोके थे। अब इससे ज्यादा मैं कर भी क्या सकत हूँ। बेचारा जो हूँ।

अरे .आपने तो मुझे सच में बेचारा समझ लिया। आपने तो विदेशों की बात छेड़  दी इसलिए मैं फ़ैल नहीं पाया। अपने देश की बात करिए तो बताऊँ। अभी जो दिल्ली और देश के दुसरे कोनों में जो घटनाए हुई हैं ( असल में देश के दुसरे तबकों के बारे में ज्यादा नहीं पता है मुझे लेकिन फिर भी ) मैंने उसपर बहोत बहस की है , मुझसे ज्यादा पुलिस  और नेताओं को किसी ने नहीं गालियाँ दी होंगी। आप चाहें तो चेक कर लें। बात करते हैं की हम सजग नहीं हैं। जाइए  जनाब अपना काम करिए चैट पर कई मित्र मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।

Monday, 28 January 2013

Nervousness

नहीं। बिलकुल नहीं। मुझे कभी भी इस बात पर ज़रा भी शक नहीं था की मैं जब भी लिखूंगा हिंदी में ही लिखूंगा। ऐसा नहीं है की मैं इंग्लिश में लिख नहीं सकता या अपनी भावनाएं नहीं प्रकट कर सकता, मैं बस ये अपने दिमाग के लिए कर रहा हूँ। हाँ , आप सही सोच रहें हैं की यहाँ तो ' दिल ' होना चाहिए था, लेकिन विश्वास मानिए ऐसा करने पर ये एक अलग ही ज्वलनशील मुद्दा बन जाएगा।

मुझे बस उन बुद्धिजीवियों से ज़रा परहेज है जो इंग्लिश की किताबें लेकर सिर्फ इसलिए सफ़र करते हैं जिससे दुसरे उन्हें  देखकर बुद्धिजीवी समझने लगें।  भईया  !!! कोई इन्हें समझाए की दुसरे आपसे बड़े वाले हैं। उन्हें तो ये भी नहीं पता होता की 'बुद्धिजीवी' दिखने क लिए किताब कौन सी ढोते हैं।

आपने भी ना मालिक , पता नहीं किस मुद्दे में फंसा दिया मुझे।

मैं तो बस बोलने में ही विश्वास  रखता था। मुझसे कहा गया की ज़नाब लिखा कीजिए, जोर पड़ता है। मैंने बहोत समझाने की कोशिश की, की भाईसाब ज़रा उस सरकारी मुलाजिम से यही बात कहिये की चचा जो मांग रहें हैं ज़रा लिख कर दिजिगा, तब आपको इस बात की गहराई का अंदाजा होगा।

फिर भी ये इन्सान चुकी काफी करीबी थे तो मैंने लिखना शुरू कर ही दिया। पर लिखूं किस बारे में। मैं तो ठहरा मासूम सा सिविल इंजिनियर, लिखता भी तो क्या ... हमारी किताबें तो चुने पत्थर , मिट्टियों और एक अदद  गन्दगी से भरी होती हैं। तो मैंने सोचा की भाई साहब से ही पूछ लिया जाए।
जवाब थोडा सहमा देने वाला था, जवाब आया -- "सामाजिक गन्दगी को रोक न सही पर चूने पत्थर जैसे बुधिजिवियों को जागरूक कर सामजिक दीवार तो खड़ी  कर ही सकते हो।"  नहीं ...नहीं ... परेशान मत होइये ..ये सुन कर मैं बेहोश नहीं हुआ।

सबसे पहले तो मुझे थोड़ी हंसी आई " बुद्धिजीवी " सुन कर। फिर जैसे तैसे हसी रोक कर, ऑंखें खोलने का नाटक करते हुए कहा - भईया थोडा ज्यादा नहीं हो गया? मतलब इस भाषा में बात ही कौन करता है आज क ज़माने में। 60 से ऊपर उठ चले हो क्या च्चा ! ये लाइने  तो अब ट्रेन के जनरल  डब्बो में बैठे मंहगाई से पीड़ित गरीब तबके के लोग भी इस्तेमाल नहीं करते भाई । तू कहाँ से आया है।
अरे इन्हें कोई तो बताओ की हम उस युग के बन्दे हैं जो शक्तिमान की छोटी मगर मोटी बातों को कबका भूल गया है, ये तो दोपहर की पहली किरण Barney Stinsion की नज़रों से देखता हैं। इनके सामने Metallica को Metal कहने की जुर्रत न करिएगा, ये आपके हलक से जबान निकल लेंगे। वो अलग बात है की उन्हें 'मिले सुर मेरा तुम्हारा ' के गायक का नाम भी नहीं पता होगा, अरे लेकिन इत्ता पुराना गायक ... याद कौन रखे भईया और भी बहोत काम हैं।

अरे आप तो अभी भी मुश्कुराए जा रहे हैं। देखिये आप मुझे  नर्वस कर रहे हैं , पता नहीं क्यूँ, लेकिन कर रहे हैं।