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Friday, 18 July 2014

सवाली ख़ुशी

स्टडी के हिसाब से एक चार साल का बच्चा दिन में करीब 400 बार हँसता है जबकि एक वयस्क (अगर आप ये पढ़ रहें हैं तो ज़नाब आप कम से कम वयस्क तो हैं ही ) करीब 15 बार . जी हाँ इसमें उस तरीका का भी हँसना है जिसे आप पागलों की तरह हँसना कहते हैं . आपके स्ट्रेस , आपका काम, आपकी priority, आप कारण कोई भी दें लेकिन ये सच है की आप हँसना भूल गए हैं.
पहले तो आप इस बात को मानते नहीं हैं. और जब मैं (पता नहीं क्यूँ ) आप पर थोडा जोर डालता हूँ तो कई बार आप किसी का नाम लेलेते हैं, किसी इंसान का, किसी चीज़ का, किसी घटना का, या कई बार "तुम नहीं समझोगे यार !!!" जैसी बुद्धिजीवियों वाले जवाब दे देते हैं.

मैंने बहोत लोगों से इस बारे में गुफ्तगुं की और मुझे बहुत से और बहुत ही अलग से (यकीन मानिए, कुछ तो यकीन ना करने की इन्तहां तक अजीब थे) कारण सुनने को मिले.

जो मैंने पाया वो ये था की हर किसी को किसी न किसी चीज़ या इंसान या कंडीशन से दिक्कत है. और वो उसके ना खुश होने का कारण है. लेकिन एक चीज़, एक कारण  जो सभी में एक जैसे थे,जिसे किसी ने नहीं कहा की ये उनके खुश ना होने का कारण है..और वो थे वो खुद.

एक इन्सान ने ये नहीं कहा की वो खुश नहीं हैं क्यूंकि वो खुद नहीं चाहता. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि वो उस जीव या निर्जीव से कुछ ज्यादा ही जुड़ गया है और आगे नहीं बढ़ रहा. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि उसने अपनी ख़ुशी खुद की जगह किसी तोते में बंद कर रखी है. वो तोता जो ना तो अब आपका है और ना ही आपके लिए.


लेकिन आप ये मानना नहीं चाहते, क्यूंकि आपक्को तो बस उस तोते से लगाव था. वो लगाव जो अब जिद्द बन गई है आपकी. जिद्द उसे वापस पाने की. और उस सवाल की , की कैसे आपका प्यारा तोता आपका नहीं है. आप अपनी जिद्द में इतने जकड जाते हैं की आपको इस सवाल के जवाब से अब मतलब नहीं होता..आपको बस ये सवाल पूछना होता है..ये सवाल जिसे सुनने वाला कोई नहीं होता और आप झुंझला जाते हैं और खुश होना आपको बेईमानी सी लगने लगती है. आपकी स्थिति एक गाडी के पीछे भागते कुत्ते की तरह हो जाती है (घबराइए नहीं मैं आपको कुत्ता नहीं कह रहा ) जो आती जाती हर गाडी के पीछे भागता तो है, लेकिन उसके रुकने के बाद समझ नहीं पाता की क्या करें. और वो ये बार बार करता है.

आप तबतक नहीं खुश रह रकते जबतक आप खुद को ये नहीं मानने पर मजबूर कर देते (मजबूर इसलिए क्यूंकि अबतक आप बात के भूत से लात के भूत में बदल चुके हैं ) की आप के पास ही आपकी ख़ुशी का राज़ है.. राज़ जो बहुत ही आसान है. आपको अपनी ख़ुशी किसी तोते के अन्दर नहीं रखनी है. उसे आपको खुद में संजोये रखना है. आपको ये समझना होगा की उस गाड़ी की रफ़्तार आपकी ख़ुशी पर नहीं टिकी है. फिर आप उस गाडी के पीछे (जी हाँ उस कुत्ते की तरह )क्यूँ भाग रहे हैं.

फिर कहीं से सवाल उठता है हम उस "ख़ुशी" (हाँ भाई ..जिसे हम अभी भी ख़ुशी मान रहे हैं) के पीछे जाना छोड़ भी देते हैं तो ससुरी इस बेरहम दुनियां में अगली ख़ुशी कहाँ से ढूंढ कर लाएं... इसका जवाब किसी बड़ी सी चीज़ में नहीं छुपा है. इसका जवाब तो उन सभी छोटी चीज़ों में है जिसपर हमने कभी ध्यान नहीं दिया.

हमारी ख़ुशी उस बेपरवाह ठहाकों में है जो अपने दोस्तों के साथ बेपरवाह लगाया करते थे.
हमारी ख़ुशी उन दो छिछोरी लाइनों में है जो किसी डायरी में दबी पड़ी है.
हमारी ख़ुशी उन सफ़ेद पन्नों के बेढंगे रंगों में है जो बक्से के एक कोने में बंद है.
हमारी ख़ुशी उन पुराने सिक्कों में है जो बचपन में इकठे करते हुए नए नोटों में सिमट गई है.
हमारी ख़ुशी उन घर की बनी मठरियों में है जो पिज़्ज़ा के खाली डब्बों के साथ घर के कोने में भरी पड़ी है.
हमारी खुशी उस खुली  छत पर है जिसे हम कमरों की आज़ादी में बंद कर आये हैं.
हमारी ख़ुशी उस चुक्कड़ की चाय में है जो hygiene के नाम पर प्लास्टिक के कपों में पड़ी है.
हमारी ख़ुशी हममें है जिसे हम दूसरों की आँखों में खोजते आए हैं.
हमारी ख़ुशी उन छोटी छोटी आदतों में है जिन्हें अपनी इच्छाओं के आड़ में बदल डाली है.
हमारी ख़ुशी इस सवाल में नहीं है की हम खुश क्यूँ नहीं हैं बल्कि इसके जवाब में है की हम पहले जितने खुश क्यूँ नहीं हैं...हमारी ख़ुशी किन्ही जवाबों में नहीं ..बल्कि उन सवालों में है जो हम खुद से करना नहीं चाहते...हमारी ख़ुशी हममे है...
 (आप तो थोड़े भावुक हो गए )

हाँ तो आप कुछ सवाल कर रहे थे!!! नहीं ?? कोई नहीं ?? अच्छा...अच्छा... वक़्त चाहिए आपको... जी हाँ ..लीजिये  लीजिये...वक़्त तो आपही का है.


Wednesday, 25 June 2014

||| दुखी हुँ अचेत नहीं... |||

जाते-जाते एक ऐहसान करते जा,
अपने सारे दर्द मेरे हिस्से भरते जा,
और कभी मेरी ख्वाइश का ज़िक्र ना करना,
अपनी खुशी में कभी मेरी फ़िक्र ना करना...

बहोत फ़ासले तय किये इस मुकाम पे आने को,
सहा है दर्द बहोत यहाँ सुकून न पाने को,
मौत की सेज़ भी सजी तो मौत लौटती बोली,
तू वक़्त ले थोड़ा और अपना दर्द बढ़ाने को...

दुःख और दर्द में अंतर आसान और इतना है,
दुःख में सिर्फ हार और दर्द में ही जितना है,
और दुःख में आते हैं विचार तो सच्चे हैं न,
क्युकि सफेदी मुश्किल और दाग अच्छे हैं न...

ये हुई दुःख-दर्द की घिसी-पिट्टी पुरानी बात,
अब है बारी करने की अर्थ की सायानी बात,
किसी भी दशा में हो बस खुशी बांटते रहो,
ना कर सको ये तो सिर्फ दुःख ही छांटते चलो...

और तेरे होने की खुशी भी संभाल ही थी,
तो तेरे जाने का गम उससे बड़ा तो नहीं,
हा मैं दुखी हूँ पर अचेत ना ही मक्कार यहाँ,
अधूरा हुँ और ना हो सकूंगा कभी साकार यहाँ...

Monday, 23 June 2014

||| जिद्दी हुँ पर कपटी नहीं... |||

असली सूरत दिखाऊ तो जिद्दी कहें सब, 
तो क्या सबकी खुशी को ढोंगी हो जाऊ अब, 
चेहरा अनेक देख के सोचता हुँ मैं भी कभी,
किसी ना किसी मोड़ क्यों टूट जाते हैं सभी...


इसी कश्मकश मे बडता चला गया हुँ मै,
अर्थ-खोज़ मे उडता चला गया हुँ मै,
नहीं सह सकता चाहे समझो कसूरवार जितना,
अपनी नज़रो मे उठा रहू क्या काफी है इत
ना...

जिद है मुझे और ख्वाईश भी है लडने की,
उम्मीद से भी ज़्यादा लत है झगडने की,
इस राह मे आए है ऐसे मुकाम कई मरतबा,
बन गया अटूट हिस्सा जिनका कोई न अर्थ था...


नहीं देख सकता अब ये नकली बनावटी लोग,
करतब करे अनेक पर मकसद सबका बस भोग,
बहोत हुआ अब बंद करो ये ढोंग स्वेत कृत्य का,
नादान नहीं सच्चे हैं वो जो टाल जाए ये छल ह्रदय का...

Monday, 16 June 2014

||| आधार |||

दिल टूटने का लिखने से क्या सम्बन्ध है, 
ठोष हृदए को विचार आने में क्या कोई प्रतिबंध है, 
जीवंत हुँ तो रखता हुँ अपना मंतव्य हर कहीं, 
इंसान बनने की राह पे बात करता हुँ जो है सही...

दिल लगाने पे भी अक्सर होती है बहस यहाँ, 
बातें हैं बेबाक परन्तु नियत तो है सहज कहाँ, 
देखती हैं ये आँखे और सुनती है किस्सा-ए-प्रज्ञा, 
जरुरत नहीं इसे दिल, ना ही किसी टूट की आज्ञा...

अगले छंद में करता हुँ बयान अपने दर्दनाक लिखने का, 
समझो तो तुम भी प्रत्यन करना अपने ना बिकने का...

अपने समाज की संरचना बड़ी कठोर और कुछ यूँ, 
पीकर वाहन चलाना मना तो बार में पार्किंग है क्यों, 
बलात्कार के मामले हर दिन मौसम के हाल के माफिक, 
इसको रोकने का उपाय करो इसकी चर्चा करते हो क्यों ||

Sunday, 15 June 2014

Thursday, 14 November 2013

नयी फटी शर्ट

रोज़ की तरह आज भी सुबह 6 बजे अलार्म की आवाज़ ने मुर्गे का काम आसान करते हुए मुझे हौले से जगाया. हाँ सच में. और कसम से गुस्सा तो मुझे आया ही नहीं. आता भी क्यूँ रोज़ का काम है उस बेचारे का. मैं बस उठा और "बहोत ही अच्छे मन से" बाथरूम की ओर तेज़ी से बढ़ा. मुझे अगर कोई सुबह सुबह बाथरूम की ओर भागता देख लेता तो उसे कारगिल पर सीमा की ओर भागते सैनिक की याद ज़रूर आ जाती.

लेकिन आज कुछ अलग हुआ. मैं बाथरूम तक नहीं पंहुच पाया. मेरे कदम बाहर से आ रही एक छोटी सी किरण ने रोक दी. एक छोटी सी रौशनी जो खिड़की के कोने से सीधे मेरे table पर आरही थी. मैंने अपने अन्दर के भाई-देर-हो-रही-है वाले इंसान को थोडा आराम दिया और खिड़की की ओर बढ़ा. खिड़की खुलते ही एक ठंढा सा हवा का झोंका मेरे चेहरे पर  पड़ा. ना बहोत खुश्क और ना ही नम, एकदम नपा तुला, सौंधी महक लिए वो ठंढा झोंका जो सूरज की चमक और गर्मी में मिलकर एक अलग सा एह्साह दे रहा था, सीधे मेरे चेहरे पर पड़ रहा था. मैंने आँखें बंद की और उस नए से एहसास  से खुद को वाकिफ कराने लगा.

लेकिन एक मिनट ....ये एहसास, ये सुकून, ये हवा कुछ जानी पहचानी सी लगी... कुछ अपनापन लिए.. किसी पुराने दोस्त की तरह. एक ऐसा एहसास जिसकी आगोश में आकर कोई परेशानी, कोई मुश्किल बस एक अफवाह से ज्यादा होने की जुर्रत नहीं करते. मेरे कानों में एक आवाज़ पड़ी - 'भाई !!! जल्दी उठ, सन्डे हैं, सात बज गए हैं, "रंगोली" के गाने छोड़ने का सोचा है क्या.' मेरी आँख एक ही आवाज़ में खुली और दो मिनट से कम वक़्त में मैं टीवी के सामने आँख फाड़े बैठा था. और पांच मिनट में मेरे सामने मेरे-सन्डे स्पेशल ब्रेड रोल और चाय थे. और पीछे से चिल्लाती माँ की आवाज़ " ठंड शुरू हो गई है कम्बल में घुसो ". उस कम्बल की गर्मी में calories और cholesterol वाले ब्रेड रोल का लुत्फ़, किशोर और मुकेश के पुराने गाने सुनते हुए लेने के बाद बारी थी सारे गमलों को पानी देने की. विश्वास करिए उन गमलों में रोबिन-हुड से लेकर गुलिवर तक की कहानियों के सेट बन चुके होते थे. ये कहानियां तब तक चलती रहतीं जबतक रोबिन-हुड और गुलिवर के बीच झगडे न शुरू हो जाते और माँ उनकी जगह हमारे पीछे झाड़ू लेकर भागती नज़र ना आने लगतीं. वैसे ये हाल कैरेम और लूडो के घंटों चलते matches के बाद भी देखने को मिल जाते थे जब नियम बनाते भी हम ही थे और तोड़ते भी. मोहल्ले में हो रहे क्रिकेट टूर्नामेंट में आप तभी जा सकते थे जब माँ किसी काम में इतनी व्यस्त हों की आप के घर पर ना होने से पैदा हुई शांति उनके परेशान होने का कारण ना बन जाए. ये एक आत्मघाती विस्फोट की तरह होता था जिसका detonation आपके लौटने के बाद आपके कारनामे और फटी हुई शर्ट खुद करती थी. उफ्.. तब तो गला फाड़ फाड़ कर रोने में भी शर्म नहीं आती थी.


मैंने ऑंखें खोली. अब मेरे अन्दर कहीं जाने की जल्दी नहीं थी. कोई झुझलाहट नहीं थी. मैंने ऑफिस फ़ोन लगाया और अपने बहोत-बहोत बीमार होने की बात बताई. लेकिन मैं बीमार नहीं हूँ. कुछ वक़्त चाहता हूँ. अपने लिए , बहोत सालों बाद. मैं इस सुबह की किरण को इस हवा को समेटना चाहता हूँ जो शायद हमेशा से मेरे आसपास ही थीं. लेकिन उन्हें देखने की मैंने न कभी कोशिश की और न ही ज़रुरत समझी. मुझे कुछ पकोड़े बनाने हैं अपने लिए जिसे चाय की हर एक चुस्की के साथ एन्जॉय करना है. मुझे कुछ कॉल करने हैं, अपने पुराने दोस्तों को जिन्हें मैं इस बड़े शेहेर की भागदौड़ में उस अमरुद के पेड़ पर छोड़ आया हूँ. कुछ चिट्ठियां लिखनी हैं उन खडूस अंकलों को जिनकी खिड़कियाँ आज भी हमारी गेंदों की निशान संजोये हुए हैं. कुछ किशोर की चुलबुली आवाज़ सुननी है, कुछ मुकेश के उफ़... वो दर्द भरे नगमे गुनगुनाने हैं. कुछ पुराणी पिक्चर देखनी हैं. एक दिन इस newspaper का मजाक बनाना है, बिना खोले बड़ा सा प्लेन बनाना है. आज थोडा कमज़ोर होना है, उस आम के पेड़ से गिरना है. आज बेवजह रोना है, कुछ आंसू बहाने हैं. फिर बिना किसी टेंशन के छत पर टेहेलना है और फिर आसमान को बेवजह घूरते हुए सो जाना है.


बहोत कुछ करना है आज. वो सब जो शायद मैं करना भूल गया हूँ, जो हम करना भूल गए हैं. कुछ ब्रेक अपने सपनों के पीछे भागने से लेते हैं और एक दिन अपने अन्दर के बचपन को देते हैं.


Happy Children-in-everyone every-day

Tuesday, 8 October 2013

मुझसे पहले मैं

इलाहाबाद रेलवे स्टेशन.
सुबह का वक़्त था. मैं ट्रेन की अपनी बहोत ही " खुशनुमा " सफ़र खत्म कर के बाहर आ रहा था. "भईया, कहीं छोड़ दूं" एक बहोत ही बूढ़ा, शायद दो दिन से भूखा जो खुद खड़े होने तक की जद्दोजहद कर रहा था, वो मुझ जैसे भारीभरकम शरीर को ढोने की बात कर रहा था. "शुक्रिया दोस्त". बस यही निकला मेरे मुंह से और मैं आगे बढ़ गया.

शुक्रिया दोस्त..??... क्या चल रहा था मेरे दिमाग में. इसबार शायद कुछ भी नहीं. कम से कम उसकी लाचारी,बेबसी तो कत्तई नहीं. मेरे दिमाग में कोई चल रहा था तो वो मैं था. मैं, जो कुछ साल पहले इसी स्टेशन से उतरा था, इन्ही कमज़ोर , कर्कस और घुटन भरी आवाज़ों के बीच से गुज़रता हुआ. नफरत और घृणा से भरा, ऐसे अप्रिय शब्दों का प्रयोग करता हुआ जो मैं खुद अपने लिए नहीं सुनना चाहूँगा.


दिल्ली मेट्रो स्टेशन.
सुहानी शाम. दोस्तों के साथ. आज अपूर्व का जन्मदिन है. सभी उतने खुश हैं जितने exams के dates खिसकने पर भी नहीं होते. चीखते चिल्लाते हम बाहर निकलते हैं.. मेरी नज़र बाहर एक औरत, जो अपने दो साल के दिखने वाले बच्चे के साथ जो उसकी गोद में एक मांस के लोथड़े की तरह पड़ा हुआ था, पर गई. लेकिन इस बार मैं उसे अपनी जेब से पैसे निकल कर नहीं दे पाया.

क्या हो गया था मुझे...क्या चल रहा था दिमाग में. क्या अखबार का वो टुकड़ा जिसमे इस तरह के भीख मांगने वालों के गोरखधंधे के बारे में लिखा था.. या ये की आखिर ये कब तक मेरी ज़िम्मेदारी है.. इस बार आगे बढ़ते वक़्त मुझमे थोडा दुःख तो था लेकिन पश्चाताप की भावना नहीं. पिछली बार तो ऐसा नहीं था. पिछली बार तो ना वो अखबार का टुकड़ा था और न ही इतनी परिपक्वता.
 
... अजीब है ना. ये आप और हम ही हैं. एक ही समय में, एक ही परिस्थिति में, अलग अलग तरह से व्यवहार करते हुए. मैंने बस अभी इस बात का उदाहरण दिया है की हमारा दिल और दिमाग एक साथ काम करते भी हैं और नहीं भी.

जब हम छोटे होते हैं तो हमें बहोत चीज़ों का ज्ञान नहीं होता, हम अपने आस पास के environment से छोटी छोटी कड़ियाँ इकट्ठी करते हैं और उन्हें जोड़ने की कोशिश करते हैं. और जो हमारे सामने आता है उसे ही परम सत्य मान कर आगे की जिंदगी बिताने का खुद से वादा कर लेते हैं. हमें गांधी के आदर्श पसंद आते हैं, हमें खाने की बर्बादी पर गुस्सा आता है, हमें ऑटो से नहीं साइकिल से स्कूल जाना है, कपडे साफ़ और प्रेस चाहिए, रोड पर हुए गड्ढों के लिए हम भगवन को कोसते हैं, हमें हिरोशिमा पर हुए हमले दुनिया की सबसे बड़ी भूल लगती है. हम कोई सवाल नहीं करते. हम बस पुरानी चल रही भावनाओं और विचारों का आँख बंद कर पालन करते हैं.
 
हम थोड़े बड़े हुए. खुद पर थोडा शक हुआ. सवालों का भूख बढ़ा तो उन्हें पूरा करने की कोशिश में लग गए. इसका परिणाम ये हुआ की अब हम गांधीवादी नहीं रह गए, खाने की बर्बादी को ecological cycles में explain करने लगे, अब हमें साइकिल पर शर्म आती है, कपड़ों के साफ होने की ज़रुरत नहीं, रोड पर हुए गड्ढों के लिए अब हम भगवान् को नहीं नगर पालिका को कोसते हैं. अब हम हिरोशिमा पर हुए हमलों को आगे कभी ना होने वाली गलती की शिक्षा के रूप में लेते हैं. काफी कुछ बदल गया है.

हम थोड़े और बड़े होते हैं. इतने की शायद अब इससे बड़े होने की कोई गुंजाईश नहीं है. अब मैं परिपक्वता की पराकाष्ठा पर हूँ. अब सवालों की भूख नहीं है मुझे. अब जवाबों की कशमकश ही है. अब गाँधी समकालीन राजनीतिक परिस्थियों के लिए गलत और सामाजिक उत्थान के लिए अच्छे लगने लगे हैं, अब एक शादी में खाने की बर्बादी वहां काम कर रहे मजदूरों के भूखे सो जाने से ज्यादा बड़ी सजा नहीं लग रही, अब साइकिल चलाना ही स्वस्थ रहने का एक जरिया नजर आता है, कपडें साफ़ ना हों तो निकृष्टता की भावना घर करती है अब, रोड हुए गड्ढों के लिए अब नगरपालिका से ज्यादा भागवान पर गुस्सा आता है की कोई फ़िक्र भी है तुम्हे इस संसार की या नहीं, अब हिरोशिमा पर हुए हमले भले ही आगे के लिए एक शिक्षा हो लेकिन वहां खोई हुई इंसानों की जिन्दगिया अब ज्यादा अफ़सोस देती है.
 
जिंदगी वापस वहीँ आगे है जहाँ से शुरू हुई थी. वही जिंदगी जो कभी दिल से,कभी दिमाग से, कभी दोनों से तो कभी दोनों के बिना आगे बढती ही है. Chaos भले ही जिंदगी की सच्चाई भी हो और भ्रम भी, लेकिन ये आपके जिंदगी में किये गए फैसले ही हैं जो इसे रोके रखते हैं और आगे भी बढाते हैं. जिंदगी का सफ़र जहाँ शुरू होता है वहीँ खत्म भी.

Happy Cycle.

Wednesday, 2 October 2013

अरे... कौन है उधर !!!

O..NO.NO.NO….Nope… मैं कैसे !! मैं इतना छोटा हूँ अभी. इतना अपरिपक्व. मैं, मेरे विचार ना तो इतने विस्तृत हैं और ना ही अनुभवी की मैं इस बारे में कुछ लिख सकूँ.
ये ही जवाब था मेरा (और शायद आपका भी ) जब मुझसे किसी दोस्त ने कहा ... "भगवान् के बारे में लिखो."
मजाक है क्या उसके बारे में लिखना जिसे मैं मानता भी हूँ और नहीं भी. जनता भी हूँ और नहीं भी.

उसके बारे में लिखना जो वस्तु भी है और भावना भी. विश्वास भी है और अंध-विश्वास भी. जिसे आप मूर्ति माने ना माने आपकी श्रधा में कोई कमी नहीं आती. जिसे हम दुःख में भी उतना ही याद करते हैं जितना सुख में. क्या लिख सकता था मैं उसके बारे में.

मैंने उसे हमेशा एक 'सिक्के' की तरह माना है. जो खुद में दो पहलु लिए होता है. लाभ भी और हानि भी. सुख भी और  दुःख भी. खूबसूरती भी और बदसूरती भी. वो किसी एक पहलु का ना तो चयनकर्ता है और ना ही उत्तरदायी.

हमें कई बार भ्रम हो जाता है की हमारे साथ जो अच्छा हो रहा है वो ऊपर बैठा कोई इश्वर कर रहा है. वहीँ जैसे ही हमारे साथ कोई बुरा होता है हमारा विश्वास कम होने लगता है. मुझे नहीं लगता की उसपर आपके कम या ज्यादा विश्वास का कोई फर्क पड़ता होगा. अगर कोई है जिसपर फर्क पड़ता है, तो वो हम हैं.

जब हम कोई काम इस उम्मीद से करते हैं की कोई है जो हमारा साथ दे रहा है, कोई है जो हमारे साथ कोई बुरा नहीं होने देगा. उस वक़्त हम सिर्फ खुद को ही नहीं अपने आसपास के सभी जीवित और निर्जीव चीज़ों में एक पॉजिटिव एनर्जी दे रहे होते हैं. वो एनर्जी जो हमारी ही बने होती है हमारे ही लिए. इसका उल्टा अगर हम लेते हैं. हम अपने दिन की शुरुआत किसी नेगटिव विचार से करते हैं, तो हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने आसपास की सभी चीज़ों को हतोत्साहित कर रहे होते हैं. हमारा खुद पर से विश्वास कम हो जाता है. और ये तो इंसानी फितरत है, अगर खुद पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं तो किसी अनजान शक्ति पर कैसे कर लें.

अगर हम टेक्निकल भाषा में बात करें तो ये एकदम एक modulus ( |x| ) की तरह है, आप इसमें पॉजिटिव वैल्यू डालें या नेगेटिव रिजल्ट हमेशा एक पॉजिटिव वैल्यू होगी. हमें नहीं पता वो कौन है लेकिन ख़ुशी हो या गम हम उसे ही याद करते हैं. ये एक ऐसा पैरामीटर है जिससे हम नेगेटिव एनर्जी और positve एनर्जी ...दोनों को explain करते हैं. 
ये एक ऐसी एनर्जी है जिससे हम सभी जुड़े हुए हैं. अगर हम किसी को दुःख में देखते हैं, भले ही उसे हम जानते हों या ना हो, हमें दुःख होता है. हम उम्मीद करते हैं की काश उसके साथ ऐसा न हुआ होता. ये इस बात का एक बड़ा उदाहरण है की हमारे अन्दर कहीं न कहीं ये बात केन्द्रित होती हैं की हम एक दुसरे से जुड़े हैं और एक दुसरे की खुशियों या दुखों से प्रभावित होते हैं. ये प्रभाव ही वो शक्ति है जिसे हम शब्दों में भगवान् कह देते हैं.

अगर हम Christianity की बात करें तो उनमे उसे GOD नाम से जाना जाता है..जो असल में तीन शब्द Generator , Operator और Destroyer. हिन्दू धर्म में भी हम उसे ब्रह्मा , विष्णु और महेष नाम नाम से जानते हैं... जिनका काम Generation, Operation और Destruction था. इसके बारे में आपको बताने की ज़रुरत नहीं लगती मुझे. मेरा बस एक ही पॉइंट है. अगर पृथ्वी के दो अलग अलग छोर पर अगर एक जैसे विचार को अगर महज एक संयोग भी मान लें, तो भी इनपर विश्वास ना करने का ठोस कारण हम नहीं दे सकते.

बड़ी बड़ी चीज़ों में उसे खोजते खोजते छोटी छोटी चीजों पर से हमारा ध्यान भटक गया है. साइंस में हमने पढ़ा है की पानी भले ही बड़े से बर्तन में हो या एक छोटे से चम्मच में, ना तो उसकी अहमियत कम होती है और ना ही उसके लिए हमारी प्राथमिकता. वैसे ही हमें भी छोटी चीजों में उसे भूलना नहीं चाहिए. बड़ी खुशियों की और भागते हुए छोटी खुशियों को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए.

जैसा की मैंने पहले भी कहा है की मैं बहोत ही साधारण सा इंसान हूँ. मुझे तो वो बस एक छोटी सी हंसी में दिखता है. ठंढे से हवा के झोंको में. रंग बदलते पत्तों में. पके हुए फल में . काम से थक कर एक दोस्त से बात करने में. एक ' miss you, kamine' वाले मेसेज में, एक फोटो पर लड़ते हुए दोस्त में, रक्षाबंधन पर बहन की तरफ से आई राखी में, एक पुराने फोटो एल्बम के अचानक मिल जाने में, ट्रेन के सही समय पर पहुचाने में, मेट्रो में मशीन की तरह घुमते वक़्त किसी पुराने दोस्त के पीछे से कंधे पर हाथ रखने में, किसी को शुक्रिया कहने पर 'मर क्यूँ नहीं जाता' सुनने में, किसी सुबह आंख खुलने पर खुद को घर पर पाने में, सुबह सुबह unhygienic सी ब्रेड रोल खाने में, बारिश में नहाने में, पहले बर्थडे बम्प्स में, तुम्हारी पहली कमाई में, यहाँ तक की एक 3G कनेक्शन में भी .... मुझे उसे मानने या ना मानने की ज़रुरत नहीं. अगर वो है तो उसे इन सब के लिए बहोत बहोत धन्यवाद. और अगर वो नहीं है तो इनसब लम्हों को मेरी जिंदगी में आने और लाने के लिए आप सभी को धन्यवाद. 

Monday, 28 January 2013

Nervousness

नहीं। बिलकुल नहीं। मुझे कभी भी इस बात पर ज़रा भी शक नहीं था की मैं जब भी लिखूंगा हिंदी में ही लिखूंगा। ऐसा नहीं है की मैं इंग्लिश में लिख नहीं सकता या अपनी भावनाएं नहीं प्रकट कर सकता, मैं बस ये अपने दिमाग के लिए कर रहा हूँ। हाँ , आप सही सोच रहें हैं की यहाँ तो ' दिल ' होना चाहिए था, लेकिन विश्वास मानिए ऐसा करने पर ये एक अलग ही ज्वलनशील मुद्दा बन जाएगा।

मुझे बस उन बुद्धिजीवियों से ज़रा परहेज है जो इंग्लिश की किताबें लेकर सिर्फ इसलिए सफ़र करते हैं जिससे दुसरे उन्हें  देखकर बुद्धिजीवी समझने लगें।  भईया  !!! कोई इन्हें समझाए की दुसरे आपसे बड़े वाले हैं। उन्हें तो ये भी नहीं पता होता की 'बुद्धिजीवी' दिखने क लिए किताब कौन सी ढोते हैं।

आपने भी ना मालिक , पता नहीं किस मुद्दे में फंसा दिया मुझे।

मैं तो बस बोलने में ही विश्वास  रखता था। मुझसे कहा गया की ज़नाब लिखा कीजिए, जोर पड़ता है। मैंने बहोत समझाने की कोशिश की, की भाईसाब ज़रा उस सरकारी मुलाजिम से यही बात कहिये की चचा जो मांग रहें हैं ज़रा लिख कर दिजिगा, तब आपको इस बात की गहराई का अंदाजा होगा।

फिर भी ये इन्सान चुकी काफी करीबी थे तो मैंने लिखना शुरू कर ही दिया। पर लिखूं किस बारे में। मैं तो ठहरा मासूम सा सिविल इंजिनियर, लिखता भी तो क्या ... हमारी किताबें तो चुने पत्थर , मिट्टियों और एक अदद  गन्दगी से भरी होती हैं। तो मैंने सोचा की भाई साहब से ही पूछ लिया जाए।
जवाब थोडा सहमा देने वाला था, जवाब आया -- "सामाजिक गन्दगी को रोक न सही पर चूने पत्थर जैसे बुधिजिवियों को जागरूक कर सामजिक दीवार तो खड़ी  कर ही सकते हो।"  नहीं ...नहीं ... परेशान मत होइये ..ये सुन कर मैं बेहोश नहीं हुआ।

सबसे पहले तो मुझे थोड़ी हंसी आई " बुद्धिजीवी " सुन कर। फिर जैसे तैसे हसी रोक कर, ऑंखें खोलने का नाटक करते हुए कहा - भईया थोडा ज्यादा नहीं हो गया? मतलब इस भाषा में बात ही कौन करता है आज क ज़माने में। 60 से ऊपर उठ चले हो क्या च्चा ! ये लाइने  तो अब ट्रेन के जनरल  डब्बो में बैठे मंहगाई से पीड़ित गरीब तबके के लोग भी इस्तेमाल नहीं करते भाई । तू कहाँ से आया है।
अरे इन्हें कोई तो बताओ की हम उस युग के बन्दे हैं जो शक्तिमान की छोटी मगर मोटी बातों को कबका भूल गया है, ये तो दोपहर की पहली किरण Barney Stinsion की नज़रों से देखता हैं। इनके सामने Metallica को Metal कहने की जुर्रत न करिएगा, ये आपके हलक से जबान निकल लेंगे। वो अलग बात है की उन्हें 'मिले सुर मेरा तुम्हारा ' के गायक का नाम भी नहीं पता होगा, अरे लेकिन इत्ता पुराना गायक ... याद कौन रखे भईया और भी बहोत काम हैं।

अरे आप तो अभी भी मुश्कुराए जा रहे हैं। देखिये आप मुझे  नर्वस कर रहे हैं , पता नहीं क्यूँ, लेकिन कर रहे हैं।