Wing Up

Wing Up
●●●
Showing posts with label Hope. Show all posts
Showing posts with label Hope. Show all posts

Friday, 18 July 2014

सवाली ख़ुशी

स्टडी के हिसाब से एक चार साल का बच्चा दिन में करीब 400 बार हँसता है जबकि एक वयस्क (अगर आप ये पढ़ रहें हैं तो ज़नाब आप कम से कम वयस्क तो हैं ही ) करीब 15 बार . जी हाँ इसमें उस तरीका का भी हँसना है जिसे आप पागलों की तरह हँसना कहते हैं . आपके स्ट्रेस , आपका काम, आपकी priority, आप कारण कोई भी दें लेकिन ये सच है की आप हँसना भूल गए हैं.
पहले तो आप इस बात को मानते नहीं हैं. और जब मैं (पता नहीं क्यूँ ) आप पर थोडा जोर डालता हूँ तो कई बार आप किसी का नाम लेलेते हैं, किसी इंसान का, किसी चीज़ का, किसी घटना का, या कई बार "तुम नहीं समझोगे यार !!!" जैसी बुद्धिजीवियों वाले जवाब दे देते हैं.

मैंने बहोत लोगों से इस बारे में गुफ्तगुं की और मुझे बहुत से और बहुत ही अलग से (यकीन मानिए, कुछ तो यकीन ना करने की इन्तहां तक अजीब थे) कारण सुनने को मिले.

जो मैंने पाया वो ये था की हर किसी को किसी न किसी चीज़ या इंसान या कंडीशन से दिक्कत है. और वो उसके ना खुश होने का कारण है. लेकिन एक चीज़, एक कारण  जो सभी में एक जैसे थे,जिसे किसी ने नहीं कहा की ये उनके खुश ना होने का कारण है..और वो थे वो खुद.

एक इन्सान ने ये नहीं कहा की वो खुश नहीं हैं क्यूंकि वो खुद नहीं चाहता. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि वो उस जीव या निर्जीव से कुछ ज्यादा ही जुड़ गया है और आगे नहीं बढ़ रहा. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि उसने अपनी ख़ुशी खुद की जगह किसी तोते में बंद कर रखी है. वो तोता जो ना तो अब आपका है और ना ही आपके लिए.


लेकिन आप ये मानना नहीं चाहते, क्यूंकि आपक्को तो बस उस तोते से लगाव था. वो लगाव जो अब जिद्द बन गई है आपकी. जिद्द उसे वापस पाने की. और उस सवाल की , की कैसे आपका प्यारा तोता आपका नहीं है. आप अपनी जिद्द में इतने जकड जाते हैं की आपको इस सवाल के जवाब से अब मतलब नहीं होता..आपको बस ये सवाल पूछना होता है..ये सवाल जिसे सुनने वाला कोई नहीं होता और आप झुंझला जाते हैं और खुश होना आपको बेईमानी सी लगने लगती है. आपकी स्थिति एक गाडी के पीछे भागते कुत्ते की तरह हो जाती है (घबराइए नहीं मैं आपको कुत्ता नहीं कह रहा ) जो आती जाती हर गाडी के पीछे भागता तो है, लेकिन उसके रुकने के बाद समझ नहीं पाता की क्या करें. और वो ये बार बार करता है.

आप तबतक नहीं खुश रह रकते जबतक आप खुद को ये नहीं मानने पर मजबूर कर देते (मजबूर इसलिए क्यूंकि अबतक आप बात के भूत से लात के भूत में बदल चुके हैं ) की आप के पास ही आपकी ख़ुशी का राज़ है.. राज़ जो बहुत ही आसान है. आपको अपनी ख़ुशी किसी तोते के अन्दर नहीं रखनी है. उसे आपको खुद में संजोये रखना है. आपको ये समझना होगा की उस गाड़ी की रफ़्तार आपकी ख़ुशी पर नहीं टिकी है. फिर आप उस गाडी के पीछे (जी हाँ उस कुत्ते की तरह )क्यूँ भाग रहे हैं.

फिर कहीं से सवाल उठता है हम उस "ख़ुशी" (हाँ भाई ..जिसे हम अभी भी ख़ुशी मान रहे हैं) के पीछे जाना छोड़ भी देते हैं तो ससुरी इस बेरहम दुनियां में अगली ख़ुशी कहाँ से ढूंढ कर लाएं... इसका जवाब किसी बड़ी सी चीज़ में नहीं छुपा है. इसका जवाब तो उन सभी छोटी चीज़ों में है जिसपर हमने कभी ध्यान नहीं दिया.

हमारी ख़ुशी उस बेपरवाह ठहाकों में है जो अपने दोस्तों के साथ बेपरवाह लगाया करते थे.
हमारी ख़ुशी उन दो छिछोरी लाइनों में है जो किसी डायरी में दबी पड़ी है.
हमारी ख़ुशी उन सफ़ेद पन्नों के बेढंगे रंगों में है जो बक्से के एक कोने में बंद है.
हमारी ख़ुशी उन पुराने सिक्कों में है जो बचपन में इकठे करते हुए नए नोटों में सिमट गई है.
हमारी ख़ुशी उन घर की बनी मठरियों में है जो पिज़्ज़ा के खाली डब्बों के साथ घर के कोने में भरी पड़ी है.
हमारी खुशी उस खुली  छत पर है जिसे हम कमरों की आज़ादी में बंद कर आये हैं.
हमारी ख़ुशी उस चुक्कड़ की चाय में है जो hygiene के नाम पर प्लास्टिक के कपों में पड़ी है.
हमारी ख़ुशी हममें है जिसे हम दूसरों की आँखों में खोजते आए हैं.
हमारी ख़ुशी उन छोटी छोटी आदतों में है जिन्हें अपनी इच्छाओं के आड़ में बदल डाली है.
हमारी ख़ुशी इस सवाल में नहीं है की हम खुश क्यूँ नहीं हैं बल्कि इसके जवाब में है की हम पहले जितने खुश क्यूँ नहीं हैं...हमारी ख़ुशी किन्ही जवाबों में नहीं ..बल्कि उन सवालों में है जो हम खुद से करना नहीं चाहते...हमारी ख़ुशी हममे है...
 (आप तो थोड़े भावुक हो गए )

हाँ तो आप कुछ सवाल कर रहे थे!!! नहीं ?? कोई नहीं ?? अच्छा...अच्छा... वक़्त चाहिए आपको... जी हाँ ..लीजिये  लीजिये...वक़्त तो आपही का है.


Monday, 30 June 2014

मौनsoon

मानसून आ रहा है। शायद आपतक आ भी गया होगा। मानसून मुझे तो बड़ा पसंद है , गरमा गरम पकोड़े के साथ कॉफ़ी ( भाई मुझे कॉफ़ी ही पसंद है तो चाय कैसे लिख दूँ :) और ठंडे ठंड पानी में छत पर नहाना। हाँ बुरा बुरा भी लगता है कई बार जब किसी काम से आप बन ठन कर बाहर जाने वाले होते हो और नालायक बारिश की वजह से निकल नहीं पाते।
कुछ वक़्त बीतता है और आपको ये समझ आता है की यार ये  जो मानसून पर आपका प्यार है ये बड़ा ही मूडी है, जब मन होता है तो पसंद आ जाता है और नहीं तो "dude ! I hate monsoon".
लेकिन एक बात तो पक्की है या तो आप मानसून को पसंद करते हैं या नापसंद। कोई बीच की फीलिंग नहीं होती। लेकिन ज़रा रुकिए.. अगर आप भी मेरी तरह ऐसा ही सोचते हैं तो मै आपको एक ऐसी जगह ले जाना चाहता हूँ जहाँ लोगों का 'मानसून प्यार' मानसून पर ही नहीं, सरकार के "ग्रामीण सड़क निर्माण योजना" पर भी depend करता है।

हाँ मुझे पता है। आपके मुंह का स्वाद अचानक से कड़वा हो गया होगा। पहला तो "ग्रामीण" पढ़ कर और दूसरा सरकारी योजना का नाम सुन कर। घबराइए मत। मैं किसी fact पर आपको उपदेश नहीं देने वाला। बस एक छोटी सी और अजीब सी स्थिति से आपको रूबरू करवाना चाहता हूँ।
बिहार। जी हाँ बिहार का एक बड़ा हिस्सा है जो मानसून की वजह से हर साल बाढ़ की चपेट में आ जाता है। लेकिन उनके चेहरे अभी भी कोई इशारा नहीं देते आपको। शायद इसलिए क्यूंकि उन्हें इसकी आदत है। या शायद इसलिए क्यूंकि उन्हें इसकी उम्मीद थी। शायद। बाढ़ आती है और कुछ दिनों में सब कुछ तबाह कर के चली जाती है।आप जो देखते हैं उससे आप थोड़ी सोच में पद जाते हैं। आप देखते हैं की पानी के कम होते ही लोग अपने घरो को दुरुस्त करने की बजाए सड़कों की तरफ जाते हैं और कुछ घरेलु औजारों से बचे हुए सड़क को पूरी तरह बिगाड़ देते हैं। अरे ये क्या बात हुई...उन्हें अपने घरों के उजड़ने से उतना गम क्यूँ नहीं है जितना की सामने से जाती सड़क के बिगड़ने से राहत ? ऐसा क्यूँ?
इसका जवाब आपको तब मिलता है जब आप इंसान की मूलभूत ज़रूरतों की महत्ता समझने की कोशिश करते हैं। बात ऐसी है की  बाढ़ ने तो उनकी जमा पूँजी का निपटारा तो कर ही दिया, और अब उनके पास जिंदगी की सबसे मूलभूत ज़रूरतों (basic needs) को पूरा करने का अगर कोई निवारण निकालता है तो वो होता है ये सड़क, जिसे बने रहने की जिम्मेदारी सरकार की ये "ग्रामीण सड़क निर्माण योजना" करती है। ये आस पास के मजदूरों को सड़क बनाने में इस्तेमाल करती है और इसके एवज में उन्हें दो वक़्त के बराबर के पैसे मिल जाते हैं। 
ये वो लोग है जिनके पास इस बात का जवाब नहीं होता की - ' मालिक मानसून आ रहा है, कैसा लग रहा है आपको '।

बुरा मत महसूस करिए। मेरा उद्देश्य कत्तई ये नहीं था। लेकिन अगर फिर भी आपको बुरा लग रहा है तो .. जनाब. आप अपनी पीठ थपथपा सकते हैं।क्यूंकि ये ही वो पहली सोच है जो बदलाव ला सकती है। बदलाव समाज में, आपमें। क्यूंकि ये वो सोच है जो आपके शिकायत करने की आदत को कम कर सकती है। हर उस बात की शिकायत जो आपके मन मुताबिक़ नहीं है। क्यूंकि हम उन तमाम लोगों से बहुत अच्छी हालत में हैं जो अफ्रीका, युगांडा जैसी जगहों पर नहीं बल्कि हमारे देश के ही किसी कोने में हैं।
तो बस अगली बार जब बारिश हो तो जरा मुस्कुराइए,  उस कार वाले को गालियाँ मत दीजिये जिसने आपके कपडे ख़राब कर दिए ( अच्छा चलिए थोडा दे लीजिये :) और उस ठेले वाले पर भी अपना गुस्सा मत निकली जो बरसात में आपकी गाडी के सामने आकर खड़ा हो गया है और आपकी आराम सफ़र में रोड़ा बन रहा है और हाँ सबसे ज़रूरी बात अपनी जिंदगी को शुक्रिया कहना मत भूलियेगा जिसने आपको चुना। और जब भी आपको अपने "busy" schedule से मौका मिले, मानसून की वजह से बेघर हुए लोगों के लिए अगर आप कुछ कर सकते हों तो ज़रूर करिए। विश्वास मानिए आपको एक नई तरह की ख़ुशी का एहसास होगा। :)
उफ़... बारिश शुरू हो गई और मैंने अभी तक बाहर से कपडे भी नहीं उतारे.. आप समझ ही रहे होंगे ,मेरी दिक्कतें ही अलग है...फिर मिलता हूँ।
:)
Happy monsoon..

Sunday, 29 June 2014

एक बूँद थप्पड़

सबसे पहले तो एक काम करिए. एक थप्पड़ जडिये खुद को. नहीं नहीं सोचिये मत. आगे बढिए. एक थप्पड़. आपका आने वाला कल आपका आभारी होगा.
मैं आपको “आपकी जिंदगी दूसरों की जिंदगी से बेहतर है” पर लेक्चर नहीं देने वाला. क्यूँ !!! क्यूंकि ऐसा है नहीं. आप जिस जगह पर हैं, आप माने या ना मानें, वे आपके चुनाव ही हैं. चुनाव जो आपने अपनी जिंदगी के हर पड़ाव पर लिए. ये आप हैं जिन्होंने फैसले तो कर लिए लेकिन उनपर अमल करने पर आपने अपना सब कुछ दांव पर नहीं लगाया. आपको ना ही पाने की गहराई का एहसास है और न ही खोने का डर. अगर किसी बात का एह्साह है आपको तो इस बात का की कहीं आप उसे खो ना दें. लेकिन आप इसका कुछ करते नहीं. मैं बताता हूँ क्यूँ ...
क्यूंकि आप डरते हैं. डरते हैं अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने से. डरते हैं हारने से. और डरते हैं बदलाव से. बदलाव जो आपको आगे भी ले जा सकता है और पीछे भी. लेकिन आप ये रिस्क नहीं लेना चाहते. और आप रिस्क लें भी क्यूँ आप जिस जगह हैं वो भले ही जैसी भी हो आपको समाज में इज्ज़त तो देता है  (ब्वाहहहाहहाहा...),और आपके वो रिश्तेदार भी खुश रहते हैं जिनको आपकी बारहवी की रिजल्ट से लेकर आपकी शौक तक में दखल देना आपको बेहद पसंद था. आप उन्हें तो नाराज़ नहीं कर सकते ना.

जैसा मैंने पहले कहा था. एक थप्पड़. प्लीज.
एक थप्पड़ हर बार जब आप खुद को आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई ना कोई बहाना लेकर आ जाते हैं. क्यूंकि शायद एक दिन ये एक थप्पड़ कोई चमत्कार कर जाए और आपको ये समझ में आए की आप जो कर रहे हैं और आप जो करना चाहते हैं उसके बीच अगर कोई आ रहा है तो वो, सरप्राइज, आप ही हैं.


यहाँ पर ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिन्होंने असम (जी हाँ इसका मतलब ~non supporting / uneven ~ होता है मेरे अंग्रेजों) परिस्थितियों में खुद को साबित किया है. आप जब खुद का इस्तेमाल अपने उद्देश्य को पाने में करने का सोचते हैं तो आश्चर्य चकित करने वाले परिणाम सामने आते हैं. आपके पास कोई और option नहीं होता उस रस्ते पर चलने के सिवा. और उस रास्ते पर चलते हुए आपको एहसास होता है की तब आपको ये एकसास होता है की ये रास्ता भले ही आसान ना हो लेकिन दिन भर इस रास्ते पर चलने के बाद भी अगर आप के हाथों कुछ नहीं आता तो आप वापस नहीं लौटते हैं, आप वहीँ किसी पेड़ के नीचे इस उम्मीद और उत्साह के साथ लेट जाते हैं की कल आप आज से जल्दी जागेंगे और आज से थोडा ही सही लेकिन ज्यादा मेहनत करेंगे. और ये सफ़र धीरे धीरे आपको आपकी मंजिल के नज़दीक ले जाता है. 
इसलिए थप्पड़ मारिये. हर बार. खुद को. और थोडा सा हर उस इंसान को जिसने आपको घर जाने के लिए कहा.

अगली बार जब हम मिले तब या तो आप खुद के बनाये रास्तों पर चल रहे हों या आपके गाल लाल हों.
:)
So Good luck.
ps. अपने पहले थप्पड़ के बारे में ज़रूर बताएं.




Wednesday, 25 June 2014

||| दुखी हुँ अचेत नहीं... |||

जाते-जाते एक ऐहसान करते जा,
अपने सारे दर्द मेरे हिस्से भरते जा,
और कभी मेरी ख्वाइश का ज़िक्र ना करना,
अपनी खुशी में कभी मेरी फ़िक्र ना करना...

बहोत फ़ासले तय किये इस मुकाम पे आने को,
सहा है दर्द बहोत यहाँ सुकून न पाने को,
मौत की सेज़ भी सजी तो मौत लौटती बोली,
तू वक़्त ले थोड़ा और अपना दर्द बढ़ाने को...

दुःख और दर्द में अंतर आसान और इतना है,
दुःख में सिर्फ हार और दर्द में ही जितना है,
और दुःख में आते हैं विचार तो सच्चे हैं न,
क्युकि सफेदी मुश्किल और दाग अच्छे हैं न...

ये हुई दुःख-दर्द की घिसी-पिट्टी पुरानी बात,
अब है बारी करने की अर्थ की सायानी बात,
किसी भी दशा में हो बस खुशी बांटते रहो,
ना कर सको ये तो सिर्फ दुःख ही छांटते चलो...

और तेरे होने की खुशी भी संभाल ही थी,
तो तेरे जाने का गम उससे बड़ा तो नहीं,
हा मैं दुखी हूँ पर अचेत ना ही मक्कार यहाँ,
अधूरा हुँ और ना हो सकूंगा कभी साकार यहाँ...

Monday, 23 June 2014

||| जिद्दी हुँ पर कपटी नहीं... |||

असली सूरत दिखाऊ तो जिद्दी कहें सब, 
तो क्या सबकी खुशी को ढोंगी हो जाऊ अब, 
चेहरा अनेक देख के सोचता हुँ मैं भी कभी,
किसी ना किसी मोड़ क्यों टूट जाते हैं सभी...


इसी कश्मकश मे बडता चला गया हुँ मै,
अर्थ-खोज़ मे उडता चला गया हुँ मै,
नहीं सह सकता चाहे समझो कसूरवार जितना,
अपनी नज़रो मे उठा रहू क्या काफी है इत
ना...

जिद है मुझे और ख्वाईश भी है लडने की,
उम्मीद से भी ज़्यादा लत है झगडने की,
इस राह मे आए है ऐसे मुकाम कई मरतबा,
बन गया अटूट हिस्सा जिनका कोई न अर्थ था...


नहीं देख सकता अब ये नकली बनावटी लोग,
करतब करे अनेक पर मकसद सबका बस भोग,
बहोत हुआ अब बंद करो ये ढोंग स्वेत कृत्य का,
नादान नहीं सच्चे हैं वो जो टाल जाए ये छल ह्रदय का...

Monday, 16 June 2014

||| आधार |||

दिल टूटने का लिखने से क्या सम्बन्ध है, 
ठोष हृदए को विचार आने में क्या कोई प्रतिबंध है, 
जीवंत हुँ तो रखता हुँ अपना मंतव्य हर कहीं, 
इंसान बनने की राह पे बात करता हुँ जो है सही...

दिल लगाने पे भी अक्सर होती है बहस यहाँ, 
बातें हैं बेबाक परन्तु नियत तो है सहज कहाँ, 
देखती हैं ये आँखे और सुनती है किस्सा-ए-प्रज्ञा, 
जरुरत नहीं इसे दिल, ना ही किसी टूट की आज्ञा...

अगले छंद में करता हुँ बयान अपने दर्दनाक लिखने का, 
समझो तो तुम भी प्रत्यन करना अपने ना बिकने का...

अपने समाज की संरचना बड़ी कठोर और कुछ यूँ, 
पीकर वाहन चलाना मना तो बार में पार्किंग है क्यों, 
बलात्कार के मामले हर दिन मौसम के हाल के माफिक, 
इसको रोकने का उपाय करो इसकी चर्चा करते हो क्यों ||

Sunday, 15 June 2014

Saturday, 14 June 2014

||| प्रतिवाद |||

कभी पीता नहीं हुँ,
होश में फिर भी रहता नहीं मैं,

सपनो में खोया रहूँ हमेशा,
पर सोता भी कहाँ हुँ मैं,

सामने दिखती है मंज़िल धुंदली,
रुका हुआ हुँ पर चलता नहीं हुँ मैं,

आशाएं लिए लाखों इस जहाँ में,
मगर पल बचे ही नहीं यहाँ मेरे,

लोभ में प्यार के फिरता हुँ,
ऐतबार है नहीं रिश्तों पे मगर मुझे,

बेमोल सा फिरता हुँ हर कहीं,
हर लम्हा बिकता हुँ इसी शहर में मैं,

झुकना सीखा ही नहीं किसी मोड़ पे,
पर सर कटाने को डरता भी हुँ मैं,

जुबान पे एक ताला सा है,
पर चुप रहता नहीं हुँ मैं ||

Wednesday, 2 October 2013

अरे... कौन है उधर !!!

O..NO.NO.NO….Nope… मैं कैसे !! मैं इतना छोटा हूँ अभी. इतना अपरिपक्व. मैं, मेरे विचार ना तो इतने विस्तृत हैं और ना ही अनुभवी की मैं इस बारे में कुछ लिख सकूँ.
ये ही जवाब था मेरा (और शायद आपका भी ) जब मुझसे किसी दोस्त ने कहा ... "भगवान् के बारे में लिखो."
मजाक है क्या उसके बारे में लिखना जिसे मैं मानता भी हूँ और नहीं भी. जनता भी हूँ और नहीं भी.

उसके बारे में लिखना जो वस्तु भी है और भावना भी. विश्वास भी है और अंध-विश्वास भी. जिसे आप मूर्ति माने ना माने आपकी श्रधा में कोई कमी नहीं आती. जिसे हम दुःख में भी उतना ही याद करते हैं जितना सुख में. क्या लिख सकता था मैं उसके बारे में.

मैंने उसे हमेशा एक 'सिक्के' की तरह माना है. जो खुद में दो पहलु लिए होता है. लाभ भी और हानि भी. सुख भी और  दुःख भी. खूबसूरती भी और बदसूरती भी. वो किसी एक पहलु का ना तो चयनकर्ता है और ना ही उत्तरदायी.

हमें कई बार भ्रम हो जाता है की हमारे साथ जो अच्छा हो रहा है वो ऊपर बैठा कोई इश्वर कर रहा है. वहीँ जैसे ही हमारे साथ कोई बुरा होता है हमारा विश्वास कम होने लगता है. मुझे नहीं लगता की उसपर आपके कम या ज्यादा विश्वास का कोई फर्क पड़ता होगा. अगर कोई है जिसपर फर्क पड़ता है, तो वो हम हैं.

जब हम कोई काम इस उम्मीद से करते हैं की कोई है जो हमारा साथ दे रहा है, कोई है जो हमारे साथ कोई बुरा नहीं होने देगा. उस वक़्त हम सिर्फ खुद को ही नहीं अपने आसपास के सभी जीवित और निर्जीव चीज़ों में एक पॉजिटिव एनर्जी दे रहे होते हैं. वो एनर्जी जो हमारी ही बने होती है हमारे ही लिए. इसका उल्टा अगर हम लेते हैं. हम अपने दिन की शुरुआत किसी नेगटिव विचार से करते हैं, तो हम न सिर्फ खुद को बल्कि अपने आसपास की सभी चीज़ों को हतोत्साहित कर रहे होते हैं. हमारा खुद पर से विश्वास कम हो जाता है. और ये तो इंसानी फितरत है, अगर खुद पर विश्वास नहीं कर पा रहे हैं तो किसी अनजान शक्ति पर कैसे कर लें.

अगर हम टेक्निकल भाषा में बात करें तो ये एकदम एक modulus ( |x| ) की तरह है, आप इसमें पॉजिटिव वैल्यू डालें या नेगेटिव रिजल्ट हमेशा एक पॉजिटिव वैल्यू होगी. हमें नहीं पता वो कौन है लेकिन ख़ुशी हो या गम हम उसे ही याद करते हैं. ये एक ऐसा पैरामीटर है जिससे हम नेगेटिव एनर्जी और positve एनर्जी ...दोनों को explain करते हैं
ये एक ऐसी एनर्जी है जिससे हम सभी जुड़े हुए हैं. अगर हम किसी को दुःख में देखते हैं, भले ही उसे हम जानते हों या ना हो, हमें दुःख होता है. हम उम्मीद करते हैं की काश उसके साथ ऐसा न हुआ होता. ये इस बात का एक बड़ा उदाहरण है की हमारे अन्दर कहीं न कहीं ये बात केन्द्रित होती हैं की हम एक दुसरे से जुड़े हैं और एक दुसरे की खुशियों या दुखों से प्रभावित होते हैं. ये प्रभाव ही वो शक्ति है जिसे हम शब्दों में भगवान् कह देते हैं.

अगर हम Christianity की बात करें तो उनमे उसे GOD नाम से जाना जाता है..जो असल में तीन शब्द Generator , Operator और Destroyer. हिन्दू धर्म में भी हम उसे ब्रह्मा , विष्णु और महेष नाम नाम से जानते हैं... जिनका काम Generation, Operation और Destruction था. इसके बारे में आपको बताने की ज़रुरत नहीं लगती मुझे. मेरा बस एक ही पॉइंट है. अगर पृथ्वी के दो अलग अलग छोर पर अगर एक जैसे विचार को अगर महज एक संयोग भी मान लें, तो भी इनपर विश्वास ना करने का ठोस कारण हम नहीं दे सकते.

बड़ी बड़ी चीज़ों में उसे खोजते खोजते छोटी छोटी चीजों पर से हमारा ध्यान भटक गया है. साइंस में हमने पढ़ा है की पानी भले ही बड़े से बर्तन में हो या एक छोटे से चम्मच में, ना तो उसकी अहमियत कम होती है और ना ही उसके लिए हमारी प्राथमिकता. वैसे ही हमें भी छोटी चीजों में उसे भूलना नहीं चाहिए. बड़ी खुशियों की और भागते हुए छोटी खुशियों को नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए.

जैसा की मैंने पहले भी कहा है की मैं बहोत ही साधारण सा इंसान हूँ. मुझे तो वो बस एक छोटी सी हंसी में दिखता है. ठंढे से हवा के झोंको में. रंग बदलते पत्तों में. पके हुए फल में . काम से थक कर एक दोस्त से बात करने में. एक ' miss you, kamine' वाले मेसेज में, एक फोटो पर लड़ते हुए दोस्त में, रक्षाबंधन पर बहन की तरफ से आई राखी में, एक पुराने फोटो एल्बम के अचानक मिल जाने में, ट्रेन के सही समय पर पहुचाने में, मेट्रो में मशीन की तरह घुमते वक़्त किसी पुराने दोस्त के पीछे से कंधे पर हाथ रखने में, किसी को शुक्रिया कहने पर 'मर क्यूँ नहीं जाता' सुनने में, किसी सुबह आंख खुलने पर खुद को घर पर पाने में, सुबह सुबह unhygienic सी ब्रेड रोल खाने में, बारिश में नहाने में, पहले बर्थडे बम्प्स में, तुम्हारी पहली कमाई में, यहाँ तक की एक 3G कनेक्शन में भी .... मुझे उसे मानने या ना मानने की ज़रुरत नहीं. अगर वो है तो उसे इन सब के लिए बहोत बहोत धन्यवाद. और अगर वो नहीं है तो इनसब लम्हों को मेरी जिंदगी में आने और लाने के लिए आप सभी को धन्यवाद. 

Friday, 9 August 2013

शायद कल

जब दिल्ली में कांड हुआ तब मैं वहां पर ही था. आप भी सोच में पड़ गए होंगे की भला किस कांड की बात कर गया मैं.एक तो हुआ नहीं है वहां. रोज नए मसाले के साथ वहां की मीडिया हमारे सामने हाज़िर रहती है. इतना मत सोचिए जनाब .. आप किसी भी केस की पहले, साथ और बाद के हालात को ले सकते हैं.

हम इंजीनियरिंग स्टुडेंट्स को अक्सर मेस में सड़ा खाना ही नसीब होता है. और खास कर दिल्ली जैसे शहर में तो रोज बाहर खाना हम जैसे afford  भी नहीं कर पाते. ऐसा नहीं है की हमारे घर वाले पैसे नहीं देते हमें. वो तो बस ऐयाशियों में उड़ जाते हैं. सो हम अक्सर रात को खाने के बाद दिल्ली मेट्रो में कुछ ठंढी हवा खाने और आँखों को सुकून दिलाने निकल पड़ते. भईया दिल्ली है ये... यहाँ रात आठ बजे भी रौनक अपने सातवें आसमान पर होती है.

रात में अपने assignment  के बोझ तले दबा ये इंजिनियर जब सुबह कुछ देर से उठा तो पूरे हॉस्टल का माहौल कुछ बदला सा था. ऐसा लग रहा था की किसी exam  का रिजल्ट अचानक से गया हो. उन कुछ मिनटों में मेरे ऊपर क्या गुज़री होगी ये शायद आपको बताने की ज़रूरत नहीं है.

मैं बहोत कुछ समझ पाता तबतक एक बंदा एक न्यूज़ पेपर का front पेज लेकर मेरे पास आया. मैं पढ़ पाता तबतक उसने सारी कहानी एक सांस में सुना दी. उस लड़की के बारे में, जो 10  दिन तक मीडिया की TRP बढा कर इस दुनिया से जाने वाली थी. और उन इंसानों के बारे में भी जो जाने किस नस्ल के थे. शायद इंसान भी ना हों. क्या पता.

करीब आधा घंटा इसपर देने के बाद मैं कॉलेज के लिए निकला. वहां भी यही हाल. लंच पर भी. सब की जबान पर एक ही बात थी. आज लोगों में गम था गुस्सा था. सभी इंडिया गेट जाना चाहते थे. सभी अपना आक्रोश ज़ाहिर करना चाहते थे. लेकिन आज लोग भटके हुए थे. डरे हुए. उन्हें ये समझ नहीं आरहा था की गुस्सा किसपर उतारें. हमारी व्यवस्था पर , हमारे समाज पर या हमारे लड़के लड़कियों पर. और सबने गुस्सा उतरा. किसी एक पर नहीं.  सभी पर उतरा.

लेकिन
सवाल अभी भी वही था... सामाजिक उत्पीडन तो हुआ था. लड़कियों का और लड़कों का. वो भले ही शारीरिक हो या मानसिक. लड़कियाँ अब रात में अपने घरों से निकलने से डरने लगीं थी. वो अपने साथ के पुरुषों से घबराने लगी थीं. लड़के अब किसी लड़की को देखने से पहले सोचते थे. किसी हमशक्ल के धोखे में अब कोई लड़का किसी लड़की को नाम से नहीं पुकारता था. बाप अपनी बेटी को दिल्ली से बाहर पढाना चाहते थे. जिनकी बेटियां पहले से दिल्ली में थीं उनके डॉक्टरों की कमाई उनके blood pressure की तरह बढ़ने लगे थे. लड़के किसी अनजान लड़की की मदद करने से घबराने लगे थे. उन चौपालों पर अब लड़कियों की बातें नहीं हुआ करती. अब कोई 'देख भाभी आज पीले सूट में आई हैं' नहीं कहता था. तेरी-वाली मेरी-वाली पर शर्तें नहीं लगती अब.  Ladies  कम्पार्टमेंट में कोई मजनू किसी का पीछा करते नहीं घुसता था. अब हमने भी खाने के बाद ठंढी हवा खाने और आँखों को सुकून दिलाने की अपनी आदत को खत्म कर दिया था. दिल्ली में रौनक तो थी लेकिन डरी, सहमी और असहाय.

व्यंग लिखने की सोचा था ..लेकिन लिखा नहीं गया ..शायद ठंढी हवा खाने की आदत अभी पूरी तरह गई नहीं. शायद ये निगाहें अभी भी रात के आठ बजे दिल्ली के मेट्रो में बेबाक, बेख़ौफ़ और बिंदास रौनकों के उम्मीद में हैं. शायद अभी हमने उमीदें रखनी खत्म नहीं की है. शायद ...