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Friday, 18 July 2014

सवाली ख़ुशी

स्टडी के हिसाब से एक चार साल का बच्चा दिन में करीब 400 बार हँसता है जबकि एक वयस्क (अगर आप ये पढ़ रहें हैं तो ज़नाब आप कम से कम वयस्क तो हैं ही ) करीब 15 बार . जी हाँ इसमें उस तरीका का भी हँसना है जिसे आप पागलों की तरह हँसना कहते हैं . आपके स्ट्रेस , आपका काम, आपकी priority, आप कारण कोई भी दें लेकिन ये सच है की आप हँसना भूल गए हैं.
पहले तो आप इस बात को मानते नहीं हैं. और जब मैं (पता नहीं क्यूँ ) आप पर थोडा जोर डालता हूँ तो कई बार आप किसी का नाम लेलेते हैं, किसी इंसान का, किसी चीज़ का, किसी घटना का, या कई बार "तुम नहीं समझोगे यार !!!" जैसी बुद्धिजीवियों वाले जवाब दे देते हैं.

मैंने बहोत लोगों से इस बारे में गुफ्तगुं की और मुझे बहुत से और बहुत ही अलग से (यकीन मानिए, कुछ तो यकीन ना करने की इन्तहां तक अजीब थे) कारण सुनने को मिले.

जो मैंने पाया वो ये था की हर किसी को किसी न किसी चीज़ या इंसान या कंडीशन से दिक्कत है. और वो उसके ना खुश होने का कारण है. लेकिन एक चीज़, एक कारण  जो सभी में एक जैसे थे,जिसे किसी ने नहीं कहा की ये उनके खुश ना होने का कारण है..और वो थे वो खुद.

एक इन्सान ने ये नहीं कहा की वो खुश नहीं हैं क्यूंकि वो खुद नहीं चाहता. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि वो उस जीव या निर्जीव से कुछ ज्यादा ही जुड़ गया है और आगे नहीं बढ़ रहा. वो इसलिए खुश नहीं है क्यूंकि उसने अपनी ख़ुशी खुद की जगह किसी तोते में बंद कर रखी है. वो तोता जो ना तो अब आपका है और ना ही आपके लिए.


लेकिन आप ये मानना नहीं चाहते, क्यूंकि आपक्को तो बस उस तोते से लगाव था. वो लगाव जो अब जिद्द बन गई है आपकी. जिद्द उसे वापस पाने की. और उस सवाल की , की कैसे आपका प्यारा तोता आपका नहीं है. आप अपनी जिद्द में इतने जकड जाते हैं की आपको इस सवाल के जवाब से अब मतलब नहीं होता..आपको बस ये सवाल पूछना होता है..ये सवाल जिसे सुनने वाला कोई नहीं होता और आप झुंझला जाते हैं और खुश होना आपको बेईमानी सी लगने लगती है. आपकी स्थिति एक गाडी के पीछे भागते कुत्ते की तरह हो जाती है (घबराइए नहीं मैं आपको कुत्ता नहीं कह रहा ) जो आती जाती हर गाडी के पीछे भागता तो है, लेकिन उसके रुकने के बाद समझ नहीं पाता की क्या करें. और वो ये बार बार करता है.

आप तबतक नहीं खुश रह रकते जबतक आप खुद को ये नहीं मानने पर मजबूर कर देते (मजबूर इसलिए क्यूंकि अबतक आप बात के भूत से लात के भूत में बदल चुके हैं ) की आप के पास ही आपकी ख़ुशी का राज़ है.. राज़ जो बहुत ही आसान है. आपको अपनी ख़ुशी किसी तोते के अन्दर नहीं रखनी है. उसे आपको खुद में संजोये रखना है. आपको ये समझना होगा की उस गाड़ी की रफ़्तार आपकी ख़ुशी पर नहीं टिकी है. फिर आप उस गाडी के पीछे (जी हाँ उस कुत्ते की तरह )क्यूँ भाग रहे हैं.

फिर कहीं से सवाल उठता है हम उस "ख़ुशी" (हाँ भाई ..जिसे हम अभी भी ख़ुशी मान रहे हैं) के पीछे जाना छोड़ भी देते हैं तो ससुरी इस बेरहम दुनियां में अगली ख़ुशी कहाँ से ढूंढ कर लाएं... इसका जवाब किसी बड़ी सी चीज़ में नहीं छुपा है. इसका जवाब तो उन सभी छोटी चीज़ों में है जिसपर हमने कभी ध्यान नहीं दिया.

हमारी ख़ुशी उस बेपरवाह ठहाकों में है जो अपने दोस्तों के साथ बेपरवाह लगाया करते थे.
हमारी ख़ुशी उन दो छिछोरी लाइनों में है जो किसी डायरी में दबी पड़ी है.
हमारी ख़ुशी उन सफ़ेद पन्नों के बेढंगे रंगों में है जो बक्से के एक कोने में बंद है.
हमारी ख़ुशी उन पुराने सिक्कों में है जो बचपन में इकठे करते हुए नए नोटों में सिमट गई है.
हमारी ख़ुशी उन घर की बनी मठरियों में है जो पिज़्ज़ा के खाली डब्बों के साथ घर के कोने में भरी पड़ी है.
हमारी खुशी उस खुली  छत पर है जिसे हम कमरों की आज़ादी में बंद कर आये हैं.
हमारी ख़ुशी उस चुक्कड़ की चाय में है जो hygiene के नाम पर प्लास्टिक के कपों में पड़ी है.
हमारी ख़ुशी हममें है जिसे हम दूसरों की आँखों में खोजते आए हैं.
हमारी ख़ुशी उन छोटी छोटी आदतों में है जिन्हें अपनी इच्छाओं के आड़ में बदल डाली है.
हमारी ख़ुशी इस सवाल में नहीं है की हम खुश क्यूँ नहीं हैं बल्कि इसके जवाब में है की हम पहले जितने खुश क्यूँ नहीं हैं...हमारी ख़ुशी किन्ही जवाबों में नहीं ..बल्कि उन सवालों में है जो हम खुद से करना नहीं चाहते...हमारी ख़ुशी हममे है...
 (आप तो थोड़े भावुक हो गए )

हाँ तो आप कुछ सवाल कर रहे थे!!! नहीं ?? कोई नहीं ?? अच्छा...अच्छा... वक़्त चाहिए आपको... जी हाँ ..लीजिये  लीजिये...वक़्त तो आपही का है.


Sunday, 29 June 2014

एक बूँद थप्पड़

सबसे पहले तो एक काम करिए. एक थप्पड़ जडिये खुद को. नहीं नहीं सोचिये मत. आगे बढिए. एक थप्पड़. आपका आने वाला कल आपका आभारी होगा.
मैं आपको “आपकी जिंदगी दूसरों की जिंदगी से बेहतर है” पर लेक्चर नहीं देने वाला. क्यूँ !!! क्यूंकि ऐसा है नहीं. आप जिस जगह पर हैं, आप माने या ना मानें, वे आपके चुनाव ही हैं. चुनाव जो आपने अपनी जिंदगी के हर पड़ाव पर लिए. ये आप हैं जिन्होंने फैसले तो कर लिए लेकिन उनपर अमल करने पर आपने अपना सब कुछ दांव पर नहीं लगाया. आपको ना ही पाने की गहराई का एहसास है और न ही खोने का डर. अगर किसी बात का एह्साह है आपको तो इस बात का की कहीं आप उसे खो ना दें. लेकिन आप इसका कुछ करते नहीं. मैं बताता हूँ क्यूँ ...
क्यूंकि आप डरते हैं. डरते हैं अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने से. डरते हैं हारने से. और डरते हैं बदलाव से. बदलाव जो आपको आगे भी ले जा सकता है और पीछे भी. लेकिन आप ये रिस्क नहीं लेना चाहते. और आप रिस्क लें भी क्यूँ आप जिस जगह हैं वो भले ही जैसी भी हो आपको समाज में इज्ज़त तो देता है  (ब्वाहहहाहहाहा...),और आपके वो रिश्तेदार भी खुश रहते हैं जिनको आपकी बारहवी की रिजल्ट से लेकर आपकी शौक तक में दखल देना आपको बेहद पसंद था. आप उन्हें तो नाराज़ नहीं कर सकते ना.

जैसा मैंने पहले कहा था. एक थप्पड़. प्लीज.
एक थप्पड़ हर बार जब आप खुद को आगे बढ़ने से रोकने के लिए कोई ना कोई बहाना लेकर आ जाते हैं. क्यूंकि शायद एक दिन ये एक थप्पड़ कोई चमत्कार कर जाए और आपको ये समझ में आए की आप जो कर रहे हैं और आप जो करना चाहते हैं उसके बीच अगर कोई आ रहा है तो वो, सरप्राइज, आप ही हैं.


यहाँ पर ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जिन्होंने असम (जी हाँ इसका मतलब ~non supporting / uneven ~ होता है मेरे अंग्रेजों) परिस्थितियों में खुद को साबित किया है. आप जब खुद का इस्तेमाल अपने उद्देश्य को पाने में करने का सोचते हैं तो आश्चर्य चकित करने वाले परिणाम सामने आते हैं. आपके पास कोई और option नहीं होता उस रस्ते पर चलने के सिवा. और उस रास्ते पर चलते हुए आपको एहसास होता है की तब आपको ये एकसास होता है की ये रास्ता भले ही आसान ना हो लेकिन दिन भर इस रास्ते पर चलने के बाद भी अगर आप के हाथों कुछ नहीं आता तो आप वापस नहीं लौटते हैं, आप वहीँ किसी पेड़ के नीचे इस उम्मीद और उत्साह के साथ लेट जाते हैं की कल आप आज से जल्दी जागेंगे और आज से थोडा ही सही लेकिन ज्यादा मेहनत करेंगे. और ये सफ़र धीरे धीरे आपको आपकी मंजिल के नज़दीक ले जाता है. 
इसलिए थप्पड़ मारिये. हर बार. खुद को. और थोडा सा हर उस इंसान को जिसने आपको घर जाने के लिए कहा.

अगली बार जब हम मिले तब या तो आप खुद के बनाये रास्तों पर चल रहे हों या आपके गाल लाल हों.
:)
So Good luck.
ps. अपने पहले थप्पड़ के बारे में ज़रूर बताएं.




Wednesday, 25 June 2014

||| दुखी हुँ अचेत नहीं... |||

जाते-जाते एक ऐहसान करते जा,
अपने सारे दर्द मेरे हिस्से भरते जा,
और कभी मेरी ख्वाइश का ज़िक्र ना करना,
अपनी खुशी में कभी मेरी फ़िक्र ना करना...

बहोत फ़ासले तय किये इस मुकाम पे आने को,
सहा है दर्द बहोत यहाँ सुकून न पाने को,
मौत की सेज़ भी सजी तो मौत लौटती बोली,
तू वक़्त ले थोड़ा और अपना दर्द बढ़ाने को...

दुःख और दर्द में अंतर आसान और इतना है,
दुःख में सिर्फ हार और दर्द में ही जितना है,
और दुःख में आते हैं विचार तो सच्चे हैं न,
क्युकि सफेदी मुश्किल और दाग अच्छे हैं न...

ये हुई दुःख-दर्द की घिसी-पिट्टी पुरानी बात,
अब है बारी करने की अर्थ की सायानी बात,
किसी भी दशा में हो बस खुशी बांटते रहो,
ना कर सको ये तो सिर्फ दुःख ही छांटते चलो...

और तेरे होने की खुशी भी संभाल ही थी,
तो तेरे जाने का गम उससे बड़ा तो नहीं,
हा मैं दुखी हूँ पर अचेत ना ही मक्कार यहाँ,
अधूरा हुँ और ना हो सकूंगा कभी साकार यहाँ...

Monday, 23 June 2014

||| जिद्दी हुँ पर कपटी नहीं... |||

असली सूरत दिखाऊ तो जिद्दी कहें सब, 
तो क्या सबकी खुशी को ढोंगी हो जाऊ अब, 
चेहरा अनेक देख के सोचता हुँ मैं भी कभी,
किसी ना किसी मोड़ क्यों टूट जाते हैं सभी...


इसी कश्मकश मे बडता चला गया हुँ मै,
अर्थ-खोज़ मे उडता चला गया हुँ मै,
नहीं सह सकता चाहे समझो कसूरवार जितना,
अपनी नज़रो मे उठा रहू क्या काफी है इत
ना...

जिद है मुझे और ख्वाईश भी है लडने की,
उम्मीद से भी ज़्यादा लत है झगडने की,
इस राह मे आए है ऐसे मुकाम कई मरतबा,
बन गया अटूट हिस्सा जिनका कोई न अर्थ था...


नहीं देख सकता अब ये नकली बनावटी लोग,
करतब करे अनेक पर मकसद सबका बस भोग,
बहोत हुआ अब बंद करो ये ढोंग स्वेत कृत्य का,
नादान नहीं सच्चे हैं वो जो टाल जाए ये छल ह्रदय का...

Sunday, 15 June 2014

Saturday, 18 January 2014

Gud-marning-दीदी

13. ये गिनती थी उन नर्सेज की जो उन 23 ICU मरीजों के बीच थीं. ये नंबर्स सुनने में जितने अजीब और बेढंगे थे उनसे जुड़ा मेरा experience उतना ही मजबूर और दिलचस्प था. 

ये हॉस्पिटल है. और यहाँ सभी परेशान, दुखी, tensed और exhausted हैं. जी हाँ .. एकदम वैसे ही जैसे हम उम्मीद करते हैं. आप जागें हों या सोने की जुर्रत ही क्यूँ न कर रहे हों आप उस सन्नाटे से डर जाते हैं जिसकी खोज आपको सुबह या कई दिनों से थी. आप समझ नहीं रहे होते हैं की आप चाह क्या रहे हैं.

पहले दिन काफी भागमभाग और उतार चढ़ाव के व्यवहार के बाद आपका मन थोडा शांत होता है. आप थक चुके होते हैं, शरीर से और मन से भी. अब आप अपने चारो तरफ देखते हैं और पाते हैं की आप पर ही सभी की नज़र टिकी है. हर तरह की बेजान नज़रें.. शायद इतनी तरह की बेबसी जिसे खत्म करने के लिए शायद हमारे पास जड़ी बूटियों की कमी पड़ जाएं. ये ऐसी जगह जान पड़ती है जहाँ आपकी दिक्कतें सबसे कम जान पड़ती हैं... लेकिन इस समय आप अपनी परेशानी को दूसरों से कम आंकने की स्थिति में नहीं हैं...आपको थोडा असहज सा लगता है, लेकिन आपकी गाडी में इतनी जगह नहीं बची हुई है की आप उस असहजता के साथ सफ़र कर सकें. इससे बचने के लिए आप आँखें बंद करते हैं, इससे आपको काम भर का 'भ्रम' मिल जाता है की कोई आपको देख नहीं रहा है.

अरे ... ये हंसने की आवाज़ कहाँ से आपके कानों में पड़ी... वो भी इतनी तेज और बेबाक हंसी.. कौन है ये insensitive इंसान, जिसे इतनी भी तमीज नहीं की एक हॉस्पिटल में इंसान को कैसा बरताव करना चाहिए.. एक मिनट.. कहीं ऐसा तो नहीं की वो आपका मज़ाक बना रहा हो... हो भी सकता है, इंसान में इंसान की कमी तो आजकल होती ही जा रही है.

आप माथे पर एक सिकन लिए हडबडा कर उस प्लास्टिक की कुर्सी से उठते हैं और इधर उधर देखने लगते हैं. देखने लगते हैं की बस वो इंसान दिख जाए जिसने ऐसा किया और आप उससे इस 'जुर्रत' के लिए अपनी जबान गन्दी कर सकें.. आप इधर उधर थोड़ी देर देखते हैं लेकिन आपको वहां कुछ नर्स ( शायद कुछ से थोड़ी ज्यादा ) और आपके जैसे ही आँखें फाड़े कुछ लोग और भी दिखते हैं जो अपने साथ किसी अपने को लेकर यहाँ आये हुए हैं.

आपको ये समझने में ज्यादा वक़्त नहीं लगता की ये ठहाके किसी और की नहीं बल्कि उन नर्सेज की हैं जो आपने सामने ही झुण्ड बना खड़ी हैं. वो आपके सामने खड़ी हैं और एक दुसरे के कानों में धीरे बोलने की ना-के-बराबर कोशिश करते हुए उनके हाथ सर्कस के किसी कलाकार की तरह दवाइयां छांटने और सिरिंज को बांटने में लगे हैं.

वो ऐसा कैसे कर सकते हैं. जी नहीं !!! ये सवाल आपके सामने के करतब बाज के लिए नहीं है, ये सवाल तो उस शख्स के लिए है जो आप पर शायद हंस रहा है. उस हंसोड़ के लिए है जो भावनाविहीन मालूम होता है. आपको अब उस इंसान से थोड़ी झुंझलाहट होने लगी है जो आपके यहाँ आने पर सबसे पहले आगे बढ़ कर आया था और अपने ऊपर सारी जिम्मेदारियां लेकर इतनी शिद्दत के साथ लग गया था. और अब वही नामुराद ऐसे निरलज्यों की तरह ठहाके लगा रहा है.

आप अभी इसी उहापोह में ही थे की तभी वहां कहीं से एक लम्बे कद की औरत जो शक्ल से ही चीफ-वार्डन लग रही थी आ जाती है. उन्हें अन्दर आता देख सारी नुर्स एक साथ शांत हो गई... चलो उन्हें ये एहसास तो है की जो वो कर रही हैं वो सही नहीं है.. आप अन्दर से थोडा खुश होते हैं... अच्छा हुआ ये आ गई..अब या तो ये खुद उनकी ये हरकत देख लेगी या मैं खुद ही उनकी इस कारस्तानी के बारे में बता दूंगा.

लेकिन ये क्या !!! सभी उस चेइफ-वार्डन की तरह तेजी से बढ़ रही हैं..और इस बार तो उनकी आवाज के साथ साथ उनके चेहरों पर भी चमक है.. सभी ने उनका हाथ पकड़ा और लगभग एक ही वक़्त में सभी के मुंह से निकला "गूड-मार्निंग- दीदी". और उन्होंने भी सभी का मुस्कुरा कर अभिवादन किया..."गूड मोर्निंग बहनों".. हाँ..यही शब्द हैं उनके. और इस बार उनकी आवाज़ पूरे वार्ड में गूँज गई. गूंजती भी क्यूँ ना, उन्होंने सारे "गूड मोर्निंग बहनों" को अपने अन्दर से descending-order में जो निकाला था.

आप अबतक जितना annoyed महसूस कर रहे थे अब उतना ही अजीब भी महसूस करने लगे हैं. आखिरकार ये लोग अपने काम के वक़्त ही तो गप्पें हांक रही थीं. लेकिन फिर भी इनके अन्दर दूसरों को छोडिये अपने सीनियर का भी डर नहीं है. आप इस सवाल को मन में लिए अपनी कुर्सी के बगल से लगे बेड पर पड़े हुए उस इंसान पर पड़ती है...आपको जो दिखता है वो एक सुकून भरा सुखद-आश्चर्य होता है. जिस इंसान को आप आधे घंटे पहले एक निर्जीव स्थिति में वहां लाये थे उसके चेहरे पर एक मुस्कान थी. एक नायब मुस्कान जो डॉक्टरों की की गई भविष्यवाणी से काफी पहले आ गई थी. एक मुस्कान जिसने आपके दिन भर के थकान को चुटकी में खत्म कर दिया था. लेकिन जरा ठेहेरिये ... उस मुस्कान का असली श्रेय किसे जाएगा... डॉक्टरों को ...अच्छी दवाइयों को या किन्ही और को .... किन्ही फूहड़ औरतों को जिनको शायद भगवन ने सबसे अच्छी हंसी से तो नहीं ही नवाजा है. 


शायद डॉक्टरों की भविष्यवाणी गलत इसलिए हो गई क्यूंकि उन्होंने दवाइयों की गिनती में कुछ ठहाकों की संख्या में कमी कर दी थी. ठहाकों की वो संख्या जो उन नर्सों को याद थीं और जिसे देने में उन्होंने कोई कंजूसी नहीं की. उस वक़्त शायद हमारे जैसे कई मरीजों को दवाइयों से ज्यादा माहौल की ज़रुरत थी, कुछ मुस्कराहट की ज़रुरत थी. वो मुस्कराहट  जिसकी यहाँ आपसे उम्मीद नहीं की जाती. इन ठहाकों के लिए ना तो इन्हें ट्रेनिंग दी जाती है और  ना ही सैलरी. और इसके बावजूद उन्होंने अपने काम को पूरे शिद्दत से पूरा किया... आपने शायद फैसला करने में थोड़ी जल्दबाजी कर दी थी. लेकिन कोई बात नहीं ... अब आपकी बारी है... कुछ गंभीरता में कटौती करने की .... कुछ अनजाने चेहरों पर अनचाही मुस्कान बिखेरने की... कुछ बेपरवाह ठहाकों की... कुछ दफा judgmental ना होने की... कुछ दूसरों के काम को appreciate करने की...कुछ खुद के काम से दूसरों को ख़ुशी देने की ...  अब आपकी बारी है कुछ उमीदों पर खरा ना उतरने की... कोशिश कीजिये... इतना मुश्किल भी नहीं है. 

Tuesday, 5 November 2013

उफ्फ्फ...तुम्हारे Opinions !

अपूर्व को इंडिया पाकिस्तान के मैच के बाद इतना गाली देते हुए आज देख रहा हूँ। मैंने उसे कहा भी की भईया इतनी बड़ी बात भी क्या हो गई। कौन सी दुनिया उजड़ गई आपकी। एक जीन्स ही तो है जो दूकानदार ने खराब दे दी है। इतना क्या स्यापा पाना इसपर। उसने जिस तरह से मुझे देखा मुझे अन्दर से महसूस हुआ की अगर बन्दे को इस वक़्त एक straw मिल जाता तो वो पक्का मेरा खून ही पी जाता। और उस दिन लगभग सारे हॉस्टल को ये बात पता चल गई की Levi's की जीन्स अगर बुरी नहीं है तो अच्छी भी नहीं है। इस तरह से एक बन्दे के सिर्फ एक जीन्स पर एक छोटी सी opinion की वजह से , ये कुछ सौ लोगों के दिमाग में levi's store में कदम रखने से पहले एक बार घंटी तो ज़रूर बजेगी।

ये सिर्फ एक जीन्स की बात नहीं है। जिंदगी की हर छोटी चीज़ जो हमसे जुडी है हम उसपर जाने अनजाने एक opinion ज़रूर बनाते हैं। और न सिर्फ ये opinion बनाते हैं बल्कि अपने आसपास के लोगों के साथ अपने विचार और experiences भी बाँटते हैं।

हम dominoes गए। वहां का खाना अच्छा या बुरा। हम अपना opinion रखते हैं।
कोई नया mall खुला शहर में। पिछले वाले से उसका comparison । हम अपना opinion रखते हैं।
मैंने नया samsung फोन लिया। बहोत गर्म होजाता है। कुह अच्छे features भी हैं। हम अपना opinion रखते हैं।
एक नयी फिल्म देखी। गाने कुछ ज्यादा ही थे। हम अपना opinion रखते हैं।

इंसानों का एक basic और अनुवांशिक nature होता है opinion बनाना। और न सिर्फ बनाना बल्कि उसे दूसरों के सामने express करना। और ये शर्मिंदा होने की बात नहीं है। बल्कि ये तो प्रमाण है की आप इंसान हैं।
ये ही opinions जब एक समूह में लिए और बनाये जाते हैं तो ये trend का रूप ले लेती है और फिर ना ही सिर्फ social बल्कि commercial और economical रूप से वर्चस्व बनाये हुए organisations को भी अपने सबसे सूक्ष्म और बेसिक समूह के हित में काम करने को मजबूर कर देती है। और आपको जानकर थोडा आश्चर्य हो सकता है लेकिन ये सूक्ष्म और बेसिक समूह कोई और नहीं हम खुद हैं।

यही वजह है की आम लोगों के opinion बनाने से बहोत से "लोगों" को डर लगता है। ये वो लोग हैं जो market में पकड़ बना चुके होते हैं और व्यावहारिक स्तर पर profit कमाना ही जिनका उद्देश्य रह गया है। और अब इन्हें अपनी गिरती value की वजह से अपने सर्विस और कीमतों में सुधार लाना होगा जिससे अंत में फायदा उस सूक्ष्म समूह को ही होगा जो हमसे बनती है।

इसीलिए opinions या तो अच्छे हों या बुरे। मीठे हों या कडवे। आप उसपर ban या रोक नहीं लगा सकते। और अगर आप या कोई राजनितिक पार्टी ऐसा करने की कोशिश करते हैं तो दो ही बातें हो सकती हैं।

1) या तो आप उस निचले और सूक्ष्म स्तर, जो की हम आम आदमी हैं, की कोई चिंता नहीं करते।
2) या आप डर गए हैं।

इसलिए अपनी बात रखिये और इंसान होने का प्रमाण दीजिये। एक ऐसा इन्सान जो ना सिर्फ जगा है बल्कि चौकन्ना भी है। जो सिर्फ विचार बनाता नहीं बल्कि उसको व्यक्त करने का साहस और हुनर दोनों रखता है। ऐसा इंसान जो अपने पूर्वजों से एक कदम आगे रहा है। जो evolution की सीढ़ी में आगे जाने को तैयार है। हम और आप। फैसला कोई भी हो.. आप अपना opinion देंगे... और उसी का मुझे इंतज़ार भी रहेगा हमेशा की तरह।